भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 649 में से

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११६ मनुस्मृति । आकाश में धूलिप्रक्षेप वा बीजवाप वा मुष्टिप्रकार के समान गिना जाता है । और जो उक्त ग्रन्थों को तामस ठहराया है वह उनकी पारिभाषिक संज्ञा है और जो पाहित्य कारणता बतलाई है वह भी— 'शङ्खचक्रोर्ध्वपुण्ड्रादिरहितो ब्राह्मणाधमः । स जीवन्नेव चण्डालः सर्वधर्मबहिष्कृतः ॥' इसके समान उनका हृद्योद्गार है । ऐसी दशा में उक्त वाक्य पद्मपुराणीय हैं वा भविष्योत्तरखण्ड के समान अनाकर हैं, यह विचारकों को उपायन किया जाता है । मायावाद—माया, अज्ञान, प्रकृति आदि नाम एकही वस्तु के हैं वह सत् वा असत् रूप से निर्वचन करने योग्य नहीं है इसीलिये अनिर्वचनीय कहलाती है । अनिर्वचनीय ख्याति का प्रतिपादन गौड ब्रह्मानन्द प्रणीत ख्यातिवाद आदि ग्रन्थों में है । उस अनिर्वचनीय-माया का विलास इन्द्रजाल आदि दृष्टान्त से आध्यात्मिक प्रकरणों में कहा है । माया के संबन्धही से वह निर्विशेष ब्रह्म 'मायी' कहलाता है 'जालवान्' बतलाया जाता है; इस विषय में 'अस्मान् मायी सृजते विश्व- मेतत्' 'य एको जालवानीशते' 'भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः' इत्यादि श्रुति प्रसिद्ध हैं जिनके पूरे विचार होने के लिये ग्रन्थान्तर की अपेक्षा है । यहां यह भी श्लोक द्रष्टव्य है— 'गुणानां परमं रूपं न दृष्टिपथमृच्छति । यत्तु दृष्टिपथं प्राप्तं तन्मायैव सुतुच्छकम् ॥' योगसूत्रीय व्यासभाष्य. 'एवं बुद्ध्वा जगद्रूपं विष्णोर्मायामयं मृषा ।' ब्रह्मपुराण.