भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 649 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 123

[Page Header] भूमिका। १२१

ऐसा विष्णुभक्ति में अभिनिवेश न रहा जैसा कि शिवद्रोह करने कराने में अभिनिवेश फैला, उधर दुराग्रही शैवों का भी यही प्रकार बढ़ा, दोनों वर्गों में मनमानी लौकिकी भक्तिही की घमाशानी उठी और सब भक्ति के प्रकार भूल गये इसी लौकिक-भक्ति के आडम्बर से भारत के अज्ञान नरनारी को मोहित कर अपने अपने वर्ग की वृद्धि करने लगे........। यह कथन उन महात्माओं वा उनके अनुयायियों के लिये है जो वर्णाश्रम-शृङ्खला को घसीटते हुए अत्याचार कर रहे हैं। जो कोई अपने को अतिवर्णी वा अत्याश्रमी मानते हैं और वैसाही बर्ताव करते हैं उनके लिये यह कोई कथन वा आक्षेप नहीं है, न हो सकता है। किं बहुना, अधिकारी ही कहे जाते हैं- 'ये ये हि वर्णाश्रमधर्मनिष्ठास्तानेव तानेव विशिष्यशिष्मः । ये केऽपि वर्णाश्रमबाह्यवृत्तास्तान्वेश्महे वक्तुमहानि षिष्मः ॥' मुक्तक.

भगवान् मनु और मनुस्मृति । पहले स्मृतियों की गणना होचुकी है उन सब स्मृतियों में मनुस्मृति ही प्रधान मानी जाती है । इसीकी सहानुभूति से अन्यान्यस्मृतियां प्रामाणिक गिनी जाती हैं। इसके बारे में वृहस्पति ने तो यह कहा है कि मनु से विरुद्ध जो कोई स्मृति है उसका प्रमाण ही नहीं है- ' वेदार्थोपनिबन्धत्वात् प्रामाण्यं हि मनोः स्मृतम् । मन्वर्थविपरीता तु या स्मृतिः सा न शस्यते ॥' ऐसा क्यों न कहा जाय, जब स्मृतियों की मूलभूत श्रुतियों ही में मनु के उपदेश की प्रशंसा प्राप्त होती है-