भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 649 में से

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बात औपनिषद् कथाभाग से भी स्पष्ट है । वर्तमान काल में तो हम सब अध्यात्मवित्त्तम होरहे हैं । मनुस्मृति के प्रत्येक अध्यायोंके अन्त में ‘भृगुप्रोक्तायां संहि- तायां’ ऐसा लेख प्राप्त होताहै उसे देखकर संदेह होताहै कि यह मनुस्मृति साक्षात् मनु की निर्मित न होगी, उसका यह तात्पर्य है कि जैसे वेदव्यास ने भगवान् श्रीकृष्ण-अर्जुन के संवाद को सात सौ श्लोकों में यथार्थ संकलित किया और उसका नाम भगवद्गीता हुआ वह भगवान् की साक्षात् उक्ति (उपदेश) होने के सबव भगवान् श्रीकृष्ण की ही बनाई मानी गई-इसी प्रकार भगवान् मनुसे सारे धर्मों को महर्षि भृगु पढ़कर मनुही की आज्ञा से ऋषियों को पढ़ाया और उसको लोकोपकार के लिये श्लोकबद्ध कर दिया वही स्मृति ‘मनुस्मृति’ नाम से लोक में विख्यात हुई। यह कथाभाग भी मनुस्मृति के प्रथमाध्याय के (५६-६०, तथा ११६) इन श्लोकों में लिखा हुआ है। और मनु से साक्षात् अथवा शिष्यपरम्परा द्वारा समय समय पर अन्यान्य ऋषियों को जो धर्म ज्ञात हुए उनका उल्लेख भी मनु के नाम से अन्यस्मृतियों में आया करता है। जैसा पाराशरस्मृति में- ‘अग्निरापश्च वेदाश्च सोमसूर्यानिलास्तथा । एते सर्वेऽपि विप्राणां श्रोत्रे तिष्ठन्ति दक्षिणे ॥ ३६ ॥ प्रभासादीनि तीर्थानि गङ्गाद्याः सरितस्तथा । विप्रस्य दक्षिणे कर्णे सांनिध्यं मनुरब्रवीत् ॥ ४० ॥’ ‘मनुना चैवमेकेन सर्वशास्त्राणि जानता । प्रायश्चित्तं तु तेनोक्तं गोघ्नश्चान्द्रायणं चरेत् ॥ ४१ ॥’ भगवान् वाल्मीकि ने भी ‘शासनाद्-८ । ३१६’ ‘राज-