भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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पृष्ठ 144

४ मनुस्मृति । उद्बबर्हात्मनश्चैव मनः सदसदात्मकम् । मनसश्चाप्यहङ्कारमभिमन्तारमीश्वरम् ॥ १४ ॥ महान्तमेव चात्मानं सर्वाणि त्रिगुणानि च । विषयाणां ग्रहीतॄणि शनैः पञ्चेन्द्रियाणि च ॥ १५ ॥ तेषां त्ववयवान्त्सूक्ष्मान् षण्णामप्यमितौजसाम् । सन्निवेश्यात्ममात्रासु सर्वभूतानि निर्ममे ॥ १६ ॥ यन्मूर्त्यवयवाः सूक्ष्मास्तस्येमान्याश्रयन्ति यत् । तस्माच्छरीरमित्याहुस्तस्य मूर्त्तिं मनीषिणः ॥ १७ ॥ अब सृष्टिक्रम कहते हैं:— ब्रह्मा ने उस परमात्मा (प्रकृति) से मन और मन से अहङ्कार, उससे महत्तत्त्व, सत्त्व, रज, तम तीनों गुण और शब्द, स्पर्श, रूप आदि विषयों के ग्राहक पांच ज्ञानेन्द्रिय और अहङ्कार इन छ के सूक्ष्म अवयवों को अपनी अपनी मात्राओं में अर्थात् शब्द, स्पर्शादिकों में मिलाकर सब स्थावर, जङ्गम रूप विश्व की रचना की । शरीर के सूक्ष्म छ अवयव अर्थात् अहङ्कार और पञ्च- महाभूत सब कार्यों के आश्रय होने से उस ब्रह्मा की मूर्त्ति को शरीर कहते हैं ॥ १४-१७ ॥ तदा विशन्ति भूतानि महान्ति सह कर्मभिः । मनश्चावयवैः सूक्ष्मैः सर्वभूतकृदव्ययम् ॥ १८ ॥ तेषामिदं तु सप्तानां पुरुषाणां महौजसाम् । सूक्ष्माभ्यो मूर्त्तिमात्राभ्यः सम्भवत्यव्ययाद्व्ययम् ॥१९॥ आद्याद्यस्य गुणन्त्वेषामवाप्नोति परः परः । यो यो यावतिथश्चैषां स स तावद्गुणः स्मृतः ॥ २० ॥