मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४ मनुस्मृति । कुछ नहीं होसकता । संसार में कोई कर्म बिना इच्छा के होते नहीं देखा गया । शास्त्रोक्त कर्मों का भलीभांति अनुष्ठान करने से स्वर्ग- लोक की प्राप्ति और इष्टकाम पूरे होते हैं ॥ ३-५ ॥ वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् । आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ॥ ६ ॥ संपूर्ण वेद, धर्ममूल हैं-वेदवेत्ताओं की स्मृति और शील- ब्रह्मज्ञता, साधु पुरुषों का आचार, और आत्म-सन्तोष ये धर्म में प्रमाण माने जाते हैं ॥ ६ ॥ यः कश्चित्कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः । स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥ ७ ॥ सर्वं तु समवेक्ष्येदं निखिलं ज्ञानचक्षुषा । श्रुतिप्रामाण्यतो विद्वान् स्वधर्मे निविशेत वै ॥ ८ ॥ श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् हि मानवः । इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् ॥ ६ ॥ जिस वर्ण का जो धर्म मनु ने कहा है, वह सब वेदोक्त है । वेद संपूर्ण ज्ञान का भण्डार है । विद्वान्, ज्ञानदृष्टिसे, वेदप्रमाण द्वारा धर्मशास्त्र को जानकर, अपने धर्म में श्रद्धा करे । जो पुरुष, वेद और स्मृतियों में कहे धर्मों का पालन करताहै, वह संसार में कीर्ति पाकर, परलोक में अक्षय सुख पाता है ॥ ७-६ ॥ श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो धर्मशास्त्रं तु वै स्मृतिः । ते सर्वार्थेष्वमीमांस्ये ताभ्यां धर्मो हि निर्बभौ ॥ १०॥ योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद्विजः । स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दकः ॥ ११ ॥ वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ १२ ॥