मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 170, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें३० मनुस्मृति । ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यं विप्रस्य पञ्चमे । राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे ॥ ३७ ॥ आषोडशाद्ब्राह्मणस्य सावित्री नातिवर्तते । आद्वाविंशात्क्षत्रबन्धोराचतुर्विंशतेर्विशः ॥ ३८ ॥ अत ऊर्ध्वं त्रयोप्येते यथाकालमसंस्कृताः । सावित्रीपतिता व्रात्या भवन्त्यार्यविगर्हिताः ॥ ३६ ॥ नैतैःपूतैर्विधिवदापद्यपि हि कर्हिचित् । ब्राह्मान्यौनांश्च सम्बन्धानाचरेद्ब्राह्मणः सह ॥ ४० ॥ वेदाध्ययन और उसके अर्थज्ञान से बढ़ा तेज ब्रह्मवर्चस है। उसकी इच्छावाले ब्राह्मण का पांचवें वर्ष, बलार्थी क्षत्रिय का छठे वर्ष, धनी होना चाहनेवाले वैश्य का आठवें वर्ष यज्ञोपवीत संस्कार करे। सोलह वर्ष तक ब्राह्मण की सावित्री नहीं जाती। क्षत्रिय की बाइस वर्ष तक और वैश्य की चौबीस वर्ष तक नहीं जाती*। अर्थात् यह उपनयन समय की परमावधि है। इस काल के बाद, ये तीनों, समय में संस्कार न होने से, सावित्रीपतित 'व्रात्य' नामक होजाते हैं और शिष्टों से निन्दित होते हैं। इन अशुद्ध व्रात्यों के साथ आपत्तिकाल में भी ब्राह्मण को, विद्या वा विवाह का सम्बन्ध न करना चाहिए ॥ ३७-४० ॥ कार्ष्णीरौरववास्तानि चर्माणि ब्रह्मचारिणः । वसीरन्नानुपूर्वेण शाणक्षौमाविकानि च ॥ ४१ ॥ मौञ्जी त्रिवृत्समा श्लक्ष्णा कार्या विप्रस्य मेखला । क्षत्रियस्य तु मौर्वीज्या वैश्यस्य शणतान्तवी ॥ ४२ ॥ मुञ्जालाभे तु कर्तव्यः कुशश्मान्तकबल्वजैः । त्रिवृता ग्रन्थिनैकेन त्रिभिः पञ्चभिरेव वा ॥ ४३ ॥
- 'आषोडशाद्ब्राह्मणस्यानतीतः काल आद्वाविंशात् क्षत्रियस्य आचतुर्विंशा- द्वैश्यस्य । यत ऊर्ध्वं पतितसावित्रीका भवन्ति ।' आश्वलायन-गृह्यसूत्र १ । २० ।