मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 180, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें४० मनुस्मृति। इन्द्रियां वश में होजाती हैं। इन्द्रियों के विषयों में फँसने से, अवश्य दोष होता है, पर उनको वश में रखने से मोक्ष होजाता है। विषय भोग की इच्छा उसके भोगने से कभी शान्त नहीं होती जैसे घृत से अग्नि कभी शान्त नहीं होता, बढ़ता ही है। जो पुरुष सब काम- नाओं को भोगता है और जो उन सब को छोड़ता है, इन दोनों में उनका छोड़ना ही अच्छा है ॥ ९२-९५ ॥ न तथैतानि शक्यन्ते संनियन्तुमसेवया । विषयेषु प्रजुष्टानि यथा ज्ञानेन नित्यशः ॥ ९६ ॥ वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च। न विप्रदुष्टभावस्य सिद्धिं गच्छन्ति कर्हिचित् ॥ ९७ ॥ श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च दृष्ट्वा च भुक्त्वा घ्रात्वा च यो नरः । न हृष्यति ग्लायति वा स विज्ञेयो जितेन्द्रियः ॥ ९८ ॥ विषयों में फँसी इन्द्रियों को, जैसा ज्ञान से वश में किया जास- कता है, वैसा विषयों के त्याग से नहीं किया जा सकता है। जिस का मन विषयों में लगा होता है, उसको वेदाध्ययन, दान, यज्ञ, नि- यम और तप कभी फल नहीं देते। जिसको कोई चीज़ सुनकर, या छूकर, या देखकर, या खाकर, या सूंघकर हर्ष वा शोक नहीं होता, उसको जितेन्द्रिय जानना चाहिए ॥ ९६-९८ ॥ इन्द्रियाणां तु सर्वेषां यद्येकं क्षरतीन्द्रियम् । तेनास्य क्षरति प्रज्ञा दृतेः पात्रादिवोदकम् ॥ ९९ ॥ वशे कृत्वेन्द्रियग्रामं संनियम्य मनस्तथा । सर्वान् संसाधयेदर्थानक्षिएवन् योगतस्तनुम् ॥ १०० ॥ पानी की मशक में छेद होजाने से उसका पानी बाहर निकल जाता है; ऐसेही यदि इन्द्रियों में से एक भी इन्द्रिय निकल कर वि- षय में लग जावे तो मनुष्य की बुद्धि में विकार होजाता है । इस लिए इन्द्रियों को और मन को वश में करके, शरीर को क्लेश न