मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२ मनुस्मृति। अग्नीन्धनं भैक्षचर्यामधःशय्यां गुरोर्हितम् । आसमावर्तनात्कुर्यात्कृतोपनयनो द्विजः ॥ १०८ ॥ आचार्यपुत्रः शुश्रूषुर्ज्ञानदो धार्मिकः शुचिः । आप्तःशक्तोऽर्थदःसाधुः स्वोऽध्याप्योदशधर्मतः॥१०६॥ नापृष्टः कस्यचिद्ब्रूयान्न चान्यायेन पृच्छतः । जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत् ॥ ११० ॥ अधर्मेण च यः प्राह यश्चाधर्मेण पृच्छति । तयोरन्यतरः प्रैति विद्वेषं वाऽधिगच्छति ॥ १११ ॥ नित्य कर्म में अनध्याय नहीं माला जाता, क्योंकि वह ब्रह्मयज्ञ कहा जाता है। उसमें ब्रह्माहुति का होम, पुण्यफल है और अन- ध्याय में वषट्कार-वेदाध्ययन के समाप्ति का शब्द किया जाता है। जो ब्रह्मचारी, एक साल तक नियम से पवित्र होकर स्वाध्याय क- रता है उसको स्वाध्याय, दूध, दही, घी और मधु बरसाता है। ब्रह्मचारी, उपनयन के बाद समावर्तन-अर्थात् वेद पढ़कर घर लौटने तक, गुरुकुल में, होम के लिए लकड़ी बटोरे, भिक्षा लावे, भूमि पर सोवे और गुरुसेवा किया करे । आचार्यपुत्र, सेवक, ज्ञान- दाता, धर्मपरायण, पवित्र, प्रामाणिक, पढ़ने योग्य, धनदाता, सदा- चारी और अपनी जाति-सम्बन्धी इन दशोंको धर्मार्थ पढ़ाना चा- हिए। बिना पूछे किसीसे न बोले और जो अन्याय से पूछे उससे भी न बोले, ऐसे मौके पर चतुरको जानकर भी अनजान सा रहना चाहिए। क्योंकि, जो अधर्म से पूछताहै या जो उत्तर देता है, उन में एक मरजाता है या आपस में विरोध होताहै ॥ १०६-१११ ॥ धर्मार्थौ यत्र न स्यातां शुश्रूषा वापि तद्विधा । तत्र विद्या न वक्तव्या शुभं बीजमिवोषरे ॥ ११२ ॥ विद्ययैव समं कामं मर्त्तव्यं ब्रह्मवादिना । आपद्यपि हि घोरायां न त्वेनमिरिणे वपेत् ॥ ११३ ॥