भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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५४ मनुस्मृति । ब्रह्मचारी के धर्म । नित्य स्नान से पवित्र होकर द्विज, देवता, ऋषि और पितरों का तर्पण, देवपूजन और होम करना चाहिए । मधु-शराब, मांस, सुगन्ध का पदार्थ, पुष्प, रस, स्त्री जो सड़ी चीज़-सिरका वगैरह और प्राणियों की हिंसा इनको छोड़ देना चाहिए । तैल लगाना, आँखों में अंजन, जूता, छतरी, काम, क्रोध, लोभ, नाच, गान, बाजा, जुआ, बकवाद करना, परनिन्दा, झूठ बोलना, स्त्रियों को देखना और छूना, दूसरे का अनहित, ये सब छोड़ देना चाहिए ॥ १७६-१७८ ॥ एकः शयीत सर्वत्र न रेतः स्कन्दयेत्क्वचित् । कामाद्धि स्कन्दयन् रेतो हिनस्ति व्रतमात्मनः ॥१८०॥ स्वप्ने सिक्त्वा ब्रह्मचारी द्विजः शुक्रमकामतः । स्नात्वार्कमर्चयित्वा त्रिः पुनर्मामित्यृचं जपेत् ॥१८१॥ उदकुम्भं सुमनसो गोशकृन्मृत्तिकाकुशान् । आहरेद्यावदर्थानि भैक्षं चाहरहश्चरेत् ॥ १८२ ॥ वेदयज्ञैरहीनानां प्रशस्तानां स्वकर्मसु । ब्रह्मचार्य्याहरेद्भैक्षं गृहेभ्यः प्रयतोऽन्वहम् ॥ १८३ ॥ गुरोः कुले न भिक्षेत न ज्ञातिकुलबन्धुषु । अलाभे त्वन्यगेहानां पूर्वं पूर्वं विवर्जयेत् ॥ १८४ ॥ हमेशा अकेला सोवे और वीर्य को न गिरावे । जो इच्छा से वीर्य- पात करता है वह अपने ब्रह्मचर्यव्रत का नाश करता है । अपनी इच्छा के बिना स्वप्न में वीर्यपात होजाय तो स्नान, सूर्यपूजन कर के 'पुनर्मामेत्विन्द्रियम्' इस ऋचा का तीन बार जप करे । जल का घड़ा, फूल, गोबर, मिट्टी और कुश ये चीज़ें ज़रूरत भर लावे और प्रतिदिन भिक्षा माँगे । वेद और यज्ञ से जो रहित नहीं हैं,