भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 649 में से

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पृष्ठ 205

दूसरा अध्याय । ६५ आचार्ये तु खलु प्रेते गुरुपुत्रे गुणान्विते । गुरुदारे सपिण्डे वा गुरुवद्वृत्तिमाचरेत् ॥ २४७ ॥ एतेष्वविद्यमानेषु स्नानासनविहारवान् । प्रयुञ्जानोऽग्निशुश्रूषां साधयेद्देहमात्मनः ॥ २४८ ॥ एवं चरति यो विप्रो ब्रह्मचर्यमविप्लुतः । स गच्छत्युत्तमं स्थानं न चेहाजायते पुनः ॥ २४६ ॥ इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां द्वितीयोऽध्यायः ॥ गुरु के मरजाने पर, विद्वान् गुरुपुत्र, गुरुस्त्री और गुरु के सहो- दर भाई आदि हों तो उनको गुरुसमान मानना चाहिये । और ये मौजूद न हों तो, गुरुस्थान में उनके अग्नि की सेवा करे और उपा- सना से निज देह को ब्रह्मलय के लायक किया करे । इस प्रकार जो ब्राह्मण, अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करता है वह परमात्मा में लय को पाकर फिर इस लोक में जन्म नहीं पाता ॥ २४७-२४६ ॥ दूसरा अध्याय पूरा हुआ ।