भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 649 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 209

तीसरा अध्याय । ६६ ऋषि के मत से क्षत्रिय, शूद्रकन्या में सन्तान पैदा करने से पतित होता है। और भृगुऋषि के मत से, शूद्रकन्या से विवाह करनेवाले वैश्य के पौत्र होजाने पर वह पतित होता है। ब्राह्मण, शूद्र स्त्री के संयोग से पतित होता है और उससे सन्तान पैदा करने से ब्राह्मणत्व से हीन होजाता है। शूद्रास्त्री की प्रधानता में देव, पितर श्राद्ध में अन्न का ग्रहण नहीं करते। और वह पुरुष स्वर्गगामी नहीं होता ॥ १६-१८ ॥ वृषलीफेनपीतस्य निःश्वासोपहतस्य च। तस्यां चैव प्रसूतस्य निष्कृतिर्न विधीयते ॥ १९ ॥ चतुर्णामपि वर्णानां प्रेत्य चेह हिताहितान् । अष्टाविमान् समासेन स्त्रीविवाहान्निबोधत ॥ २० ॥ ब्राह्मो दैवतथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः । गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥ २१ ॥ यो यस्य धर्म्यो वर्णस्य गुणदोषौ च यस्य यौ । तत् सर्वं प्रवक्ष्यामि प्रसवे च गुणागुणान् ॥ २२ ॥ शूद्रा का अधर चुम्बन से और उसकी सांस लगने से, उस पुरुष की और उसके सन्तान की पापशुद्धि का कोई उपाय नहीं है। चारों वर्णों का लोक और परलोक में हित अहित करनेवाला, आठ प्रकार का विवाह होता है-ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच। जिस वर्णका जो विवाह धर्मानुकूल है और जो गुण, दोष जिसमें है और उनसे पैदा सन्तानों में जो हैं, उनको कहता हूं ॥ १६-२२ ॥ षडानुपूर्व्या विप्रस्य क्षत्रस्य चतुरोऽवरान् । विट्शूद्रयोस्तु तानेव विद्याद्धर्म्यान राक्षसान् ॥ २३ ॥ चतुरो ब्राह्मणस्याद्यान् प्रशस्तान् कवयो विदुः । राक्षसं क्षत्रियस्यैकमासुरं वैश्यशूद्रयोः ॥ २४ ॥