भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 649 में से

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पृष्ठ 216

१६ मनुस्मृति । जिस कुल में स्त्रियों का सत्कार नहीं है वह उनके शाप से नष्ट होजाता है जैसे मारण करने से होजाता है। इस कारण सत्कार के मौके पर और उत्सवों पर सदा गहना, वस्त्र और भोजन से स्त्रियों को सन्तुष्ट करना चाहिए। जिस कुल में स्त्री अपने पति से और पति स्त्री से सन्तुष्ट रहते हैं, उस कुल में अवश्य कल्याण होता है। यदि स्त्री शोभित न हो तो पति को प्रसन्न नहीं कर सकती और बिना खुशी, सन्तान नहीं हो सकती ॥ ५८-६१॥ स्त्रियां तु रोचमानायां सर्वं तद्रोचते कुलम् । तस्यां त्वरोचमानायां सर्वमेव न रोचते ॥ ६२ ॥ कुविवाहैः क्रियालोपैर्वेदानध्ययनेन च । कुलान्यकुलतां यान्ति ब्राह्मणातिक्रमेण च ॥ ६३ ॥ शिल्पेन व्यवहारेण शूद्रापत्यैश्च केवलैः । गोभिरश्वैश्च यानैश्च कृष्या राजोपसेवया ॥ ६४ ॥ स्त्री भूषित हों तो सारे कुल की शोभा है, नहीं तो परिवार की शोभा नहीं होती। दूषित विवाहों से, कर्म के लोप से, वेद के न पढ़ने से और ब्राह्मणों का अपमान करने से उत्तम कुल भी अधम हो जाता है। शिल्प-भांति भांति की कारीगरी करने से, लेन देन करने से, सिर्फ शूद्रा स्त्री में सन्तान पैदा करने से, गौ, घोड़ा, सवारी आदि के खरीद-बिक्री करने से, खेती और राजा की चाकरी करने से उत्तम कुल बिगड़ जाता है ॥ ६२-६४ ॥ अयाज्ययाजनैश्चैव नास्तिक्येन च कर्मणाम् । कुलान्याशु विनश्यन्ति यानि हीनानि मन्त्रतः॥ ६५ ॥ मन्त्रतस्तु समृद्धानि कुलान्यल्पधनान्यपि । कुलसंख्यां च गच्छन्ति कर्षन्ति च महद्यशः ॥ ६६ ॥ वैवाहिकेऽग्नौ कुर्वीत गृह्यं कर्म यथाविधि । पञ्चयज्ञविधानं च पंक्तिं चान्वाहिकीं गृही ॥ ६७ ॥

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