भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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पृष्ठ 220

८० मनुस्मृति । विश्वेदेव के निमित्त गृहाग्निमें द्विजोंको नित्य होमकरना चाहिए वह आहुति पहले अग्नि और सोम को फिर दोनों को एक वार में, फिर विश्वेदेवको उसके बाद धन्वन्तरिको देनी चाहिए*॥८४-८५॥ कुह्वै चैवानुमत्यै च प्रजापतय एव च । सहद्यावापृथिव्योश्च तथा स्विष्टकृतेऽन्ततः ॥ ८६ ॥ एवं सम्यग्घविर्हुत्वा सर्वदिक्षु प्रदक्षिणम् । इन्द्रान्तकाप्यतीन्दुभ्यः सानुगेभ्यो बलिं हरेत् ॥८७॥ मरुद्भ्य इति तु द्वारि क्षिपेदप्स्वद्भ्य इत्यपि । वनस्पतिभ्य इत्येवं मुसलोलूखले हरेत् ॥ ८८ ॥ उच्छीर्षके श्रियै कुर्याद्भद्रकाल्यै च पादतः । ब्रह्मवास्तोष्पतिभ्यां तु वास्तुमध्ये बलिं हरेत् ॥ ८६ ॥ कुहू-अमावास्या, अनुमति-पूर्णिमा और प्रजापति को आहुति दे । द्यावा और पृथिवी को साथ में दे और अन्त में स्विष्टकृत को आहुति देना चाहिये । इस प्रकार, अच्छी विधि से होम करके सब दिशाओं में प्रदक्षिणा करे । इन्द्र, यम, वरुण, चन्द्र और इनके अनुचरों को बलि देय । घर के द्वार में मरुत को बलि देय, जल, मूसल-ओखली और वनस्पति को बलि देय । वास्तु पुरुष के शिर पर अर्थात् घर के ईशान कोण में-श्रियै नमः कह कर बलि देय । वास्तु के चरण में-भद्रकाल्यै नमः, मध्य में-घर के बीच में-ब्रह्म- वास्तोष्पतीभ्यां नमः कहकर बलि देय ॥ ८६-८६ ॥ विश्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो बलिमाकाश उत्क्षिपेत् । दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो नक्तं चारिभ्य एव च ॥ ६० ॥ पृष्ठवास्तुनि कुर्वीत बलिं सर्वात्मभूतये ।

  • इस प्रकार आहुति करने में यों बोलना-अग्नये स्वाहा, सोमाय स्वाहा, अग्नी- सोमाभ्यां स्वाहा, विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा, धन्वन्तरये स्वाहा ।