मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 227, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय। ८७ एकैकमपि विद्वांसं दैवे पित्र्ये च भोजयेत् । पुष्कलं फलमाप्नोति नामन्त्रज्ञान्बहूनपि ॥ १२६ ॥ अमावास्या के प्रेतकर्म को पितृकर्म कहते हैं। उसको जो करता है वह नित्य लौकिक फल को पाता है। वेदपाठी, सदाचारी, ब्राह्मण को ही देव और पितृकर्म का अन्न आदि देना चाहिए, ऐसा दान महाफल को देता है। देवकर्म और पितृकर्म में एक एक भी विद्वान् ब्राह्मण को भोजन देने से बड़ा फल मिलता है। पर बहुत से मूर्खों को भी खिलाने से वह फल नहीं मिलता ॥ १२७-१२६ ॥ दूरादेव परीक्षेत ब्राह्मणं वेदपारगम् । तीर्थं तद्धव्यकव्यानां प्रदाने सोऽतिथिःस्मृतः ॥१३०॥ सहस्रं हि सहस्राणामनृचां यत्र भुञ्जते । एकस्तान्मन्त्रवित्प्रीतः सर्वानर्हति धर्मतः ॥ १३१ ॥ ज्ञानोत्कृष्टाय देयानि कव्यानि च हवींषि च । न हि हस्तावरुग्दिग्धौ रुधिरेणैव शुद्ध्यतः ॥ १३२ ॥ यावतो ग्रसते ग्रासान्हव्यकव्येष्वमन्त्रवित् । तावतो ग्रसते प्रेत्य दीप्तशूलर्ष्ट्ययोगुडान् ॥ १३३ ॥ वंशपरम्परा से ही वेदज्ञ ब्राह्मण को जान रक्खे क्योंकि वह ब्राह्मण हव्य, कव्य देने का पात्र है। उसको देने से अतिथि के समान फल होता है। जिस श्राद्ध में वेद न जाननेवाले दस लाख ब्राह्मण भोजन करते हों, उसका फल एकही वेदविशारद ब्राह्मण को भोजन कराने से होता है। हव्य और कव्य ज्ञानवृद्ध ब्राह्मण को देना चाहिए, मूर्ख को नहीं। क्योंकि रुधिर से सनेहुए हाथ रुधिर से ही शुद्ध नहीं होते। वेदहीन ब्राह्मण देव और पितृकर्म में जितने हव्य-कव्य के ग्रास खाता है, उतने ही जलते हुए शूल, ऋष्टि और लोहगोला यजमान को निगलने पड़ते हैं ॥ १३०-१३३ ॥ ज्ञाननिष्ठा द्विजाः केचित्तपोनिष्ठास्तथापरे ।