भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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६० मनुस्मृति । दौहित्रं विट् पतिं बन्धुमृत्विग्याज्यौ च भोजयेत्॥१४८॥ न ब्राह्मणं परीक्षेत दैवे कर्मणि धर्मवित् । पित्र्ये कर्मणि तु प्राप्ते परीक्षेत प्रयत्नतः ॥ १४६ ॥ ये स्तेनपतितक्कीबा ये च नास्तिकवृत्तयः । तान् हव्यकव्ययोर्विप्राननर्हान् मनुरब्रवीत् ॥ १५०॥ यदि योग्य, ब्राह्मण न मिलें तो श्राद्ध में मित्र कोही खिलादे । पर शत्रु विद्वान् को भी न भोजन करावे—वह निष्फल होता है। वेदपारगामी ऋग्वेदी ब्राह्मण को, यजुर्वेदी को, समाप्ति तक सामवेद जाननेवाले को, श्राद्ध में अच्छीभांति भोजन कराना चाहिए । इन में से कोई भी ब्राह्मण जिसके श्राद्ध में आदर से भोजन पाता है, उसके सात पीढ़ी तक के पितर तृप्त होते हैं । यह हव्य और कव्य की प्रथम विधि है और सत्पुरुषों से आच- रित गौण विधि इस प्रकार है-यदि ऊपर कहे ब्राह्मण न मिलें तो नाना, मामा, भानजा, ससुर, गुरु, जामाता, मौसेरा भाई, ऋत्विज और यज्ञ करानेवालों को भोजन देना । देवकर्म में ब्राह्मण की परीक्षा न करे ओर पितृकर्म में यत्न से परीक्षा करनी चाहिए । जो चोर पतित वा नपुंसक हों, नास्तिकभाव से जीविका करता हो उन ब्राह्मणों को मनुजी ने देवकर्म और पितृकर्म में अयोग्य कहा है॥ १४४-१५० ॥ जटिलं चानधीयानं दुर्बलं कितवं तथा । याजयन्ति च ये पूगांस्तांश्च श्राद्धे न भोजयेत्॥ १५१॥ चिकित्सकान् देवलकान् मांसविक्रयिणस्तथा । विपणेन च जीवन्तो वर्ज्याः स्युर्हव्यकव्ययोः ॥ १५२॥ प्रेष्यो ग्रामस्य राज्ञश्च कुनखी श्यावदन्तकः । प्रतिरोद्धा गुरोश्चैव त्यक्ताग्निर्वार्धुषिस्तथा ॥ १५३ ॥