भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 649 में से

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पृष्ठ 255

चौथा अध्याय । ११५ ब्राह्मण को ऋत से, अमृत से, मृत से और प्रमृत से या सत्य और अनृत से जीविका करनी चाहिए। लेकिन श्ववृत्ति-नौकरी-गुलामी से निर्वाह न करना चाहिए। उञ्छ और शिल को ऋत, बिना मांगे मिलाहुआ अमृत, मांगी हुई भिक्षा मृत और खेती को प्रमृत कहते हैं। सत्यानृत-सच-झूठ वाणिज्य-व्यापार को कहते हैं, उससे भी जीविका चलाना श्रेष्ठ है। श्ववृत्ति-अर्थात् कुत्ता की वृत्ति-सेवा को कहते हैं, इसलिए उसको छोड़ देना चाहिए ॥ ४-६ ॥ कुशूलधान्यको वा स्यात्कुम्भीधान्यक एव वा । त्र्यहैहिको वापि भवेदश्वस्तनिक एव वा ॥ ७ ॥ चतुर्णामपि चैतेषां द्विजानां गृहमेधिनाम् । ज्यायान् परः परो ज्ञेयो धर्मतो लोकजित्तमः ॥ ८ ॥ षट्कर्मैको भवत्येषां त्रिभिरन्यः प्रवर्तते । द्वाभ्यामेकश्चतुर्थस्तु ब्रह्मसत्रेण जीवति ॥ ६ ॥ ब्राह्मण इतना अन्न संग्रह करे जिसमें कोठी भरजाय, या छोटी कोठरी भरजाने भरका अन्न संग्रह करे, या तीन दिन के गुज़र लायक अथवा एकही दिन के प्रयोजन भरको इकट्ठा रक्खे। इन चारों प्रकार के संग्रह को करनेवालों में अगला अगला ब्राह्मण श्रेष्ठ माना जाता है और वह धर्म से स्वर्गफल को जीतनेवाला होता है। इन चार प्रकार के गृहस्थों में ऋत आदि छ प्रकार की वृत्ति से निर्वाह करना बड़े गृहस्थ के लिए है। जो साधारण कुटुम्ब रखते हैं, वे यज्ञ कराना, वेदपढ़ाना और दान लेना इन तीन प्रकार की जीविकाओं से निर्वाह करें। प्रतिग्रह-दान लेना जो नहीं चाहते, उनको याजन और अध्यापन इन दो वृत्तियों से और चौथा केवल वेद पढ़ाकर एकही वृत्ति से निर्वाह करना चाहिए ॥ ७-६ ॥ वर्तयंश्च शिलोञ्छाभ्यामग्निहोत्रपरायणः । इष्टीः पार्व्वायनान्तीयाः केवला निर्वपेत् सदा ॥ १० ॥