भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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पृष्ठ 257

चौथा अध्याय । ११७ होता है। ब्राह्मण को गाना, बजाना और शास्त्र के खिलाफ़ कर्म करके दुःख के समय में भी धन पाने का उद्यम न करना चाहिए। इन्द्रियों के विषय शब्द-स्पर्श आदि में कामना से न लगना चाहिए वरन् इन सब बातों से मनको रोकना चाहिए ॥ १४-१६ ॥ सर्वान् परित्यजेदर्थान् स्वाध्यायस्य विरोधिनः । यथा तथाध्यापयंस्तु सा ह्यस्य कृतकृत्यता ॥ १७ ॥ वयसःकर्मणोऽर्थस्य श्रुतस्याभिजनस्य च । वेषवाग्बुद्धिसारूप्यमाचरन् विचरेदिह ॥ १८ ॥ बुद्धिवृद्धिकराण्याशु धन्यानि च हितानि च । नित्यं शास्त्राण्यवेक्षेत निगमांश्चैव वैदिकान् ॥ १९ ॥ जिन कामों को करने से अपने स्वाध्याय में बाधा पड़े उन सब को छोड़ देना उचित है। किसी क़दर स्वाध्याय में लगा रहने से ही ब्राह्मण की कृतार्थता है। गृहस्थ ब्राह्मण को अपनी आयु, कर्म, धन-विद्या और कुल के अनुसार वेष-पहनाव, वाणी और बुद्धि से काम लेता हुआ इस संसार में बर्ताव करना चाहिए। बुद्धि को शीघ्र ही बढ़ानेवाले आगम और विविध भांतिके शास्त्रों का अध्य- यन नित्य करना चाहिए। उनके देखने से हित अनहित बातों का पूरा ज्ञान होता है ॥ १७-१९ ॥ यथा यथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति । तथा तथा विजानाति विज्ञानं चास्य रोचते ॥ २० ॥ ऋषियज्ञं देवयज्ञं भूतयज्ञं च सर्वदा । नृयज्ञं पितृयज्ञं च यथाशक्ति न हापयेत् ॥ २१ ॥ एतानेके महायज्ञान् यज्ञशास्त्रविदो जनाः । अनीहमानाः सततमिन्द्रियेष्वेव जुह्वति ॥ २२ ॥