भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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चौथा अध्याय । ११६ नवेमानर्चिता ह्यस्य पशुहव्येन चाग्नयः । प्राणानेवात्तुमिच्छन्ति नवान्नामिषगार्द्धितः ॥ २८ ॥ आसनाशनशय्याभिरद्भिर्मूलफलेन वा । नास्य कश्चिद्वसेद्गेहे शक्तितोऽनर्चितोऽतिथिः ॥२९॥ पाखण्डिनो विकर्मस्थान् वैडालव्रतिकान् शठान् । हैतुकान् बकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत् ॥ ३० ॥ वेदविद्याव्रतस्नातान् श्रोत्रियान् गृहमेधिनः । पूजयेद्धव्यकव्येन विपरीतांश्च वर्जयेत् ॥ ३१ ॥ नवीन अन्न से इष्टि करके नया अन्न और पशुयाग करके मांस खाने से दीर्घायु होती है। यदि नवीन अन्न और मांस से यज्ञ किये विना कोई नया अन्न और मांस खाता है उसकी प्रजा को ही अग्निदेव खाने की इच्छा करते हैं। गृहस्थ के यहां आसन, भोजन, शय्या, जल, फल और फूल से यथाशक्ति अतिथि का सत्कार ज़रूर होना चाहिए इसके बिना वह न रहने पावे। वेद के ख़िलाफ़ आचरण करनेवाले पाखण्डी, आश्रम के विरुद्ध वृत्ति से जीविका करनेवाले, दम्भ से वैडालव्रत-बिल्ली के भांति मौन साधनेवाले शठ, कुतर्की और वगलाभक्त इन सब कपटियों का ज़बान से भी सत्कार गृहस्थ को न करना चाहिए ॥ २७-३१ ॥ शक्तितोऽपचमानेभ्यो दातव्यं गृहमेधिना । संविभागश्च भूतेभ्यः कर्त्तव्योऽनुपरोधतः ॥ ३२ ॥ राजतो धनमन्विच्छेत् संसीदन् स्नातकः क्षुधा । याज्यान्तेवासिनोर्वापि नत्वन्यत इति स्थितिः॥ ३३ ॥ विद्यास्नातक, व्रतस्नातक और विद्याव्रतस्नातक इन तीन प्रकार के श्रोत्रिय गृहस्थों का देव-पितृकर्म में सत्कार करना चाहिए। जो ऐसे न हों उनको पूछना न चाहिए। गृहस्थ को