मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२४ मनुस्मृति। में से खुदही अपनी माला निकालना न चाहिए। मूत्र, मल, थूक, जिस वस्तु में अपवित्र कुछ लगा हो और ज़हर इन सब को जल में न डालना चाहिए। सूने घर में अकेला सोना, अपने से बड़े को उपदेश देना, रजस्वला स्त्री से बातचीत करना और बिना निमन्त्रण यज्ञ में जाना यह सब अनुचित है॥ ५५-५७॥ अग्न्यगारे गवां गोष्ठे ब्राह्मणानां च सन्निधौ । स्वाध्याये भोजने चैव दक्षिणं पाणिमुद्धरेत् ॥ ५८ ॥ नावारयेद् गां धयन्तीं न चाचक्षीत कस्यचित्। न दिवीन्द्रायुधं दृष्ट्वा कस्यचिद्दर्शयेद्बुधः ॥ ५६ ॥ नाधार्मिके वसेद्ग्रामे न व्याधिबहुले भृशम् । नैकः प्रपद्येताध्वानं न चिरं पर्वते वसेत् ॥ ६० ॥ न शूद्रराज्ये निवसेन्नाधार्मिकजनावृते । न पाखण्डिगणाक्रान्ते नोपसृष्टेऽन्त्यजैर्नृभिः ॥ ६१ ॥ अग्निस्थान, गोशाला, ब्राह्मण के पास, स्वाध्याय के समय और भोजन के समय दाहना हाथ बाहर करलेना चाहिए। बच्चे को दूध पिलाती गौ को देखकर उसको हटाना नहीं और न किसी से कहना। और आकाश में इन्द्रधनुष् देखकर किसीको दिखाना न चाहिए। जहां अधर्मी रहते हों ऐसे ग्राम में और जहां रोग फैला हो, उसमें न रहना। अकेला दूरदेश की यात्रा न करे और पर्वत के ऊपर बहुत दिनतक निवास न करना चाहिए शूद्रके राज्य में बसना न चाहिए और अधर्मी, पाखण्डी तथा चाण्डाल सेवित ग्राम आदि में न रहना चाहिए ॥ ५८-६१ ॥ न भुञ्जीतोद्धृतस्नेहं नातिसौहित्यमाचरेत् । नातिप्रगे नातिसायं न सायं प्रातराशितः ॥ ६२ ॥ न कुर्वीत वृथा चेष्टां न वार्यञ्जलिना पिवेत्।