मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२८ मनुस्मृति । यो ह्यस्य धर्ममाचष्टे यश्चैवादिशति व्रतम् । सोऽसंवृतं नाम तमः सह तेनैव मज्जति ॥ ८१ ॥ न संहताभ्यां पाणिभ्यां कण्डूयेदात्मनः शिरः । न स्पृशेच्चैतदुच्छिष्टो न च स्नायाद्विना ततः ॥ ८२ ॥ शूद्र को वेद आदि शास्त्र न पढ़ाना, जूठा अन्न, हविष्य न देना। उसको धर्मका उपदेश न देना। उसको चान्द्रायण आदि व्रतों का उपदेश वेदमन्त्रों से न बतलाना। जो पुरुष, शूद्र को धर्म, व्रत आदि का उपदेश देता है, वह उस शूद्र के साथ, असंवृत नामक नरक में पड़ता है। दोनों हाथों से अपना शिर न खुजलाना, जूंठे मुख शिर को न छूना और शिर भिगोए विना स्नान न करना अर्थात् नित्य शिर से स्नान करना चाहिए ॥ ८०-८२ ॥ केशग्रहान्प्रहारांश्च शिरस्येतान् विवर्जयेत् । शिरःस्नातस्य तैलेन नाङ्गं किञ्चिदपि स्पृशेत् ॥ ८३ ॥ न राज्ञः प्रतिगृह्णीयादराजन्यप्रसूतितः । सूनाचक्रध्वजवतां वेशेनैव च जीवताम् ॥ ८४ ॥ दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वजः । दशध्वजसमो वेशो दशवेशसमो नृपः ॥ ८५ ॥ दशसूनासहस्राणि यो वाहयति सौनिकः । तेन तुल्यः स्मृतो राजा घोरस्तस्य प्रतिग्रहः ॥ ८६ ॥ किसी के शिर के बाल खींचना या उसपर मारना अनुचित है। जिस हाथ से शिरपर तेल छोड़े उस हाथ से दूसरे अङ्ग का स्पर्श न करे। जो राजा, क्षत्रिय के वीर्य से न पैदा हुआ हो उसका दान न लेना चाहिए। कसाई, तेली, कलवार, और वेश्याओं के जरिये जो जीविका चलाते हैं इन सबसे दान न लेना चाहिए !