भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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३३२ मनुस्मृति । निर्घाते भूमिचलने ज्योतिषां चोपसर्जने । एतानाकालिकान् विद्यादनध्यायानृतावपि ॥ १०५ ॥ वर्षाकाल में प्रातःकाल और सायंकाल होमार्थ अग्नि प्रज्वलित करते समय, बिजली, वर्षा और मेघगर्जना होने पर, या वर्षा के सिवा असमय बादल होजाने पर, अनध्याय करना चाहिए। आ- काश में कड़ाका, भूकम्प और सूर्य, चन्द्र का ग्रहण होने पर, उतने काल के लिए अनध्याय जानना । और वर्षार्ऋतु में इन बातों के होनेपर भी 'आकालिक अनध्याय' जानना चाहिए ॥ १०४-१०५ ॥ प्रादुष्कृतेष्वग्निषु तु विद्युत्स्तनितनिःस्वने । सज्योतिः स्यादनध्यायः शेषरात्रौ यथा दिवा ॥१०६॥ नित्यानध्याय एव स्याद्ग्रामेषु नगरेषु च । धर्मनैपुण्यकामानां पूतिगन्धे च सर्वदा ॥ १०७॥ अन्तर्गतशवे ग्रामे वृषलस्य च सन्निधौ । अनध्यायो रुद्यमाने समवाये जनस्य च ॥ १०८ ॥ उदके मध्यरात्रे च विण्मूत्रस्य विसर्जने । उच्छिष्टःश्राद्धभुक् चैव मनसापि न चिन्तयेत् ॥ १०६॥ प्रतिगृह्य द्विजो विद्वानेकोद्दिष्टस्य केतनम् । त्र्यहं न कीर्तयेद्ब्रह्म राज्ञो राहोश्च सूतके ॥ ११० ॥ होम के लिए अग्नि जल जाने पर प्रातःकाल विजली चमके और मेघ गर्जे तब सायंकाल तक और सायंकाल को हो तब आ- काश में नक्षत्र देखने तक अनध्याय करना । और यह सब उपद्रव एकबारगी हो तो दिन-रात का अनध्याय होता है। जो विशेष धर्म का अनुष्ठान किया चाहते हैं उनको गांव, नगर और अपवित्र स्थान में रोज़ही अनध्याय करना चाहिए अर्थात्; ऐसे स्थान में धर्मकृत्य ठीक नहीं बन पड़ता । गांव में मुरदा पड़ा हो, शूद्र के