मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ
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१५० मनुस्मृति ।
है* जो वेदवेत्ता न हो, या बहुतों को साथही यज्ञ कराता हो और जिसमें नपुंसक वा स्त्री होम करनेवाले हों, ऐसे यज्ञों में ब्राह्मण को भोजन कभी न करना चाहिए ॥ २०३-२०५ ॥ अश्रीकमेतत् साधूनां यत्र जुह्वत्यमी हविः । प्रतीपमेतद्देवानां तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥ २०६ ॥ मत्तक्रुद्धादुराणां च न भुञ्जीत कदाचन । केशकीटावपन्नञ्च पदा स्पृष्टञ्च कामतः ॥ २०७ ॥ भ्रूणघ्नावेक्षितञ्चैव संस्पृष्टं चाप्युदक्यया । पतत्रिणावलीढं च शुना संस्पृष्टमेव च ॥ २०८ ॥ गवा चान्नमुपघ्रातं घुष्टान्नं च विशेषतः । गणान्नं गणिकान्नं च विदुषा च जुगुप्सितम् ॥ २०६ ॥ कुधान्य-निर्णय । जिस यज्ञ में ऐसे लोग हवन करते हैं वह साधुओं को श्रीहीन करनेवाला है, देवताओं के विरुद्ध है। इस लिए उसको छोड़ देना चाहिए । मतवाला, क्रोधी और रोगी का अन्न कभी न खाना बाल, कीड़ा पड़ा हो, पैर-से छुआ हो उस अन्नको भी न खाना। भ्रूणहत्या करनेवाले का देखा हुआ, रजस्वला का छुआ, पक्षी का खाया, कुत्ता का छुआ भी न खाना। गौ का सूंघा हुआ, 'जो चाहे खाजाय' ऐसा पुकार कर कहा हुआ, बहुतों की मदद से भण्डारे का अन्न, वेश्या का अन्न, यह सब निन्दित अन्न हैं ॥ २०६--२०६॥ स्तेनगायनयोश्चान्नं तक्षणो वार्द्धुषिकस्य च । दीक्षितस्य कदर्यस्य बद्धस्य निगडस्य च ॥ २१० ॥
- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, दया, सहनशीलता, अक्रूरता, मधुर वचन को यम कहते हैं । स्नान, मौन, उपवास, वेदाध्ययन, शौच, अक्रोध, अप्रमाद आदि नियम हैं । इन दोनों का पालन करने से फल होता है केवल एकही से नहीं । इस लिये सबको दोनों नियमों का पालन आवश्यक है ।