मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 295, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय । १५५ तावुभौ गच्छतः स्वर्गं नरकं तु विपर्यये ॥ २३५ ॥ न विस्मयेन तपसा वदेदिष्ट्वा च नानृतम् । नार्त्तोऽप्यपवदेद्विप्रान्न दत्त्वा परिकीर्त्तयेत् ॥ २३६ ॥ सवारी और शय्या देनेवाला अभयदाता ऐश्वर्य, धान्यदाता अक्षय सुख और वेदाध्यापक ब्रह्मलोक को पाता है। इन सब दानों में वेद का दान सब से उत्तम माना जाता है। जिस सात्त्विक, राजस आदि भावों से दान दिया जाता है उस भाव का फल दाता को मिलता है। जो आदर से दान देता है और जो आदरसे लेता है उन दोनों को स्वर्गफल मिलता है। नहीं तो उलटा फल मिलता है। तप करके अभिमान न करना, यज्ञ करके झूठ न बोलना, ब्राह्मणों से दुःख पाकर भी उनको दुर्वचन न कहना और दान देकर न कहना, यह सत्पुरुषों का कार्य है ॥ २३२-२३६ ॥ यज्ञोऽनृतेन क्षरति तपः क्षरति विस्मयात् । आयुर्विप्रापवादेन दानं च परिकीर्त्तनात् ॥ २३७॥ धर्मं शनैः संचिनुयाद्वल्मीकमिव पुत्तिकाः । परलोकसहायार्थं सर्वभूतान्यपीडयन् ॥ २३८॥ नामुत्र हि सहायार्थं पिता माता च तिष्ठतः । न पुत्रदारा न ज्ञातिर्धर्मस्तिष्ठति केवलः ॥ २३६ ॥ एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रलीयते । एकोऽनुभुंक्ते सुकृतमेक एव च दुष्कृतम् ॥ २४० ॥ मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ । विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुगच्छति ॥ २४१॥ असत्य से यज्ञ निष्फल होजाता है, गर्व से तप क्षीण होजाता है। ब्राह्मणों की निन्दा से आयु घटती है। दान करके खुद बड़ाई