भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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पृष्ठ 301

पांचवां अध्याय । १६१ लशुनं गृञ्जनं चैव पलाण्डुं कवकानि च । अभक्ष्याणि द्विजातीनाममेध्यप्रभवानि च ॥ ५ ॥ लोहितान्वृक्षनिर्यासान् व्रश्चनप्रभवांस्तथा । शेलुं गव्यं च पेयूषं प्रयत्नेन विवर्जयेत् ॥ ६ ॥ वृथा कृसरसंयावं पायसापूपमेव च । अनुपाकृतमांसानि देवान्नानि हवींषि च ॥ ७ ॥ लहसुन, प्याज़, भूपुष्प-कुकुरमुत्ता और दूसरे अपवित्र खाद से पैदा होनेवाले पदार्थ द्विजों को न खाना चाहिए । वृक्षों से आप ही निकला, या काटने से निकला लाल गोंद, गूलर, लह- सोड़ा और दश दिन के भीतर में गौ के दूध का पाक इन पदार्थों को ज़रूर छोड़ना चाहिए । तिल, चावल की खिचड़ी, दूध, गुड़, आटा की लपसी, दूध का पाक, मालपुआ, बिना संस्कार का मांस, देवनििमत्त बना अन्न, यज्ञ का हविष्य इन पदार्थों को देवार्पण बिना किये खाना न चाहिए ॥ ५-७ ॥ अनिर्दशाया गोः क्षीरमौष्ट्रमैकशफं तथा । आाविकं सन्धिनीक्षीरं विवत्सायाश्च गोःपयः ॥ ८ ॥ आरण्यानां च सर्वेषां मृगाणां माहिषं विना । स्त्रीक्षीरं चैव वर्ज्यानि सर्वशुक्तानि चैव हि ॥ ९ ॥ दधि भक्ष्यं च शुक्तेषु सर्वं च दधिसम्भवम् । यानि चैवाभिषूयन्ते पुष्पमूलफलैः शुभैः ॥ १० ॥ क्रव्यादाञ्छकुनान्सर्वांस्तथा ग्रामनिवासिनः । अनिर्दिष्टांश्चैकशफांटिट्टिभं च विवर्जयेत् ॥ ११ ॥ कलविंकं प्लवं हंसं चक्राङ्गं ग्रामकुक्कुटम् । २१