मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६६ मनुस्मृति । नियुक्तस्तु यथान्यायं यो मांसं नात्ति मानवः । स प्रेत्य पशुतां याति सम्भवानेकविंशतिम् ॥ ३५ ॥ असंस्कृतान्पशून्मन्त्रैर्नाद्याद्विप्रः कदाचन । मन्त्रैस्तु संस्कृतानद्याच्छाश्वतं विधिमास्थितः ॥ ३६ ॥ कुर्याद्घृतपशुं सङ्गे कुर्यात् पिष्टपशुं तथा । न त्वेव तु वृथा हन्तुं पशुमिच्छेत्कदाचन ॥ ३७ ॥ जो भक्षण के योग्य प्राणी हैं उनको प्रतिदिन खाने से, खाने वाला दोषभागी नहीं होता । क्योंकि, भक्षण करने योग्य प्राणी और उनके भक्षकों को, परमात्मा ने ही रचा है । यज्ञ के निमित्त से मांसभक्षण दैवी विधि कहलाती है। लेकिन देवार्पण के बिना मांस खाना राक्षसविधि कही जाती है । मोल लेकर, या आप ही मारकर, या दूसरे ने लाकर दिया हो, ऐसे मांस को देवता और पितरों को अर्पण करके खाने से दोष नहीं होता । आपत्ति- काल न हो तो विधि को जाननेवाला द्विज कभी मांसभक्षण अविधि से न करे—क्योंकि बिना विधि से जो मांसभक्षण करता है, उसके मरने पर उसका मांस वे प्राणी खाते हैं । रोज़गार के लिए जो पशु मारते हैं उनको वैसा पाप नहीं होता जैसा बिना देवता और पितरों को चढ़ाये मांस खानेवाले को होता है। श्राद्ध आदि में विधि से जो मांसभक्षण नहीं करता, वह मरके इक्कीस वार पशुयोनि में जन्म लेता है। मन्त्रों से जिनका संस्कार नहीं हुआ उन पशुओं को ब्राह्मण कभी न खावे । पर सनातन वेद विधि के अनुसार संस्कार किया गया हो तो अवश्य खोवे । मांस खाने ही की इच्छा हो तो घृत का पशु या मैदा का पशु बनाकर विधि से मांस खावे । पर देव निमित्त के बिना पशु मारने की इच्छा कभी न करना चाहिए ॥ ३०-३७ ॥ यावन्ति पशुरोमाणि तावत्कृत्वो ह मारणम् । वृथा पशुघ्नः प्राप्नोति प्रेत्य जन्मनि जन्मनि ॥ ३८ ॥