मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 309, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंपांचवां अध्याय । १६६ अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी । संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातकाः ॥ ५१ ॥ स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति । अनभ्यर्च्यपितॄन्देवांस्ततोऽन्योनास्त्यपुण्यकृत्॥५२॥ जो विधि छोड़कर, पिशाच के भांति मांस भक्षण नहीं करता वह सबका प्रिय होजाता है। और रोगों से दुःखी नहीं होता है। जिसकी राय से मारा जाता है, अङ्गों को काटकर अलग अलग करनेवाला, मारनेवाला, खरीदनेवाला, बेचनेवाला, पकानेवाला, परोसनेवाला और खानेवाला ये सब घातक-मारनेवाले होते हैं । जो पुरुष, देवता और पितरों का पूजन बिना किये, दूसरे के मांस से अपना मांस बढ़ाना चाहता है, उससे बढ़कर कोई पाप करने वाला नहीं है ॥ ४६-५२ ॥ वर्षे वर्षेऽश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः । मांसानि च न खादेद्यस्तयोः पुण्यफलं समम् ॥ ५३ ॥ फलमूलाशनैर्मेध्यैर्मुन्न्यन्नानां च भोजनैः । न तत्फलमवाप्नोति यन्मांसपरिवर्जनात् ॥ ५४ ॥ मांसभक्षयितामुत्र यस्य मांसमिहाद्मयहम् । एतन्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ५५ ॥ न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने । प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ॥ ५६ ॥ जो सौ वर्ष तक प्रतिवर्ष अश्वमेध यज्ञ करता है और जो जन्म भर मांस भक्षण नहीं करता, इन दोनों को समान पुण्य फल मि- लता है। पवित्र फल, मूल और मुनि अन्नों के खाने से वह फल नहीं मिलता जो मांस छोड़ने से प्राप्त होता है। इस लोक में जिस २२