मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 31, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका । २६ वर्णाश्रमधर्मविचार, शास्त्रप्रकोप और परीक्षा । भगवान् मनु ने कहा है कि— 'अर्थे कामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते । धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ॥' .. अर्थ और काम में असक्तों (अलोलुपों) के लिये धर्मोप- देश है और धर्म खोजनेवालों को धर्मनिर्णयार्थ श्रुति (वेद) ही सर्वोपरि प्रमाण है । वेद का प्रतिपाद्य कर्म, उपासना और ज्ञान है । यद्यपि वेदार्थ, ऋग्-यजुः-साम भेद से तथा शाखा- भेद से अपरिच्छिन्न है; तौभी भगवान् जैमिनि और भगवान् वेदव्यास के निरूपित सूत्रों से वह परिच्छिन्न हो गया है । भलेही कालवश से वेदशाखाओं का लोप हो जाय परंतु उक्त सूत्रों से वेद-रहस्य रक्षित हो रहा है; इस कारण वर्त- मान काल में भी अधिकारी के लिये अभ्युदय-निःश्रेयस (भुक्ति- मुक्ति) का द्वार खुला है । इससे स्पष्ट है कि श्रौत तथा स्मार्त वाङ्मयमात्र का रहस्य पूर्वोत्तरमीमांसा है और उनके कर्ता जैमिनि-व्यास वेदपारदृश्वा हैं । इस विषय में पाराशरीय प्रमाणवचन पहिले लिखा जा चुका है । वेद के शब्द और अर्थ-ये दो शरीर हैं। उसमें शब्द-शरीर की रक्षा-शिक्षा-व्याकरण-निरुक्त और छन्द से है, अर्थ-शरीर की रक्षा ज्योतिष कल्पसूत्र और उपाङ्ग से है। इस प्रकार ऋग्-यजुः-सामरूप वेद के शब्दार्थरूप शरीर के अङ्ग तथा उपाङ्ग सहायक हैं। अङ्ग-उपाङ्ग कहने से यह अभिप्राय नहीं है कि जैसे लोक में अङ्गोपाङ्ग का समुदायरूप अङ्गी है, वा अङ्गोपाङ्ग के नाश होजाने से अङ्गी नष्ट होजाता है; किंतु वेद