मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 316, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें१७६ मनुस्मृति । नहीं है। पाखण्डी, दुराचारी स्त्री, गर्भ और पति का घात करने- वाली और मद्य पीनेवाली स्त्री को जलदान न करना। अपने आ- चार्य, उपाध्याय, पिता, माता और गुरु के शव को उठाने और दाह करने से, ब्रह्मचारी अपने व्रत से पतित नहीं होता है ॥८६-९१॥ दक्षिणेन मृतं शूद्रं पुरद्वारेण निर्हरेत् । पश्चिमोत्तरपूर्वैस्तु यथायोगं द्विजन्मनः ॥ ६२ ॥ न राज्ञामघदोषोऽस्ति व्रतिनां न च सत्रिणाम् । ऐन्द्रं स्थानमुपासीना ब्रह्मभूता हिते सदा ॥ ६३ ॥ राज्ञो माहात्मिके स्थाने सद्यः शौचं विधीयते । प्रजानां परिरक्षार्थमासनञ्चात्र कारणम् ॥ ६४ ॥ डिम्बाहवहतानां च विद्युता पार्थिवेन च । गोब्राह्मणस्य चैवार्थे यस्य चेच्छति पार्थिवः ॥६५॥ शूद्र के मृत शरीर को, नगर के दक्षिण द्वार से और ब्राह्मण- क्षत्रिय-वैश्य के शव को क्रम से पश्चिम, उत्तर और पूर्व द्वार से श्मशान में लेजाना चाहिए। राजा, ब्रह्मचर्य व्रत करनेवाला और यज्ञ करनेवाला सूतकी नहीं होता। क्योंकि-राजा इन्द्र के पद पर है। ब्रह्मचारी और याज्ञिक सदा ब्रह्मरूप ही है। जो पुरुष राजा के यहां श्रेष्ठ स्थान पर नियुक्त होता है। वह कार्य करने के निमित्त तुरंत ही अशौच से मुक्त होता है। क्योंकि प्रजारक्षा के लिए न्यायासन पर बैठना ही इसमें कारण है। बिना राजा की लड़ाई में, बिजली से, राजाज्ञा फांसी से और गौ-ब्राह्मण के रक्षा के लिए मरे हुए का और जिसको राजा अपने कार्य के लिए चाहे, उसकी तत्काल शुद्धि होती है ॥ ६२-६५ ॥ सोमाग्न्यर्कानिलेन्द्राणां वित्तापत्योर्यमस्य च । अष्टानां लोकपालानां वपुर्धारयते नृपः ॥ ६६ ॥