मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 324, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें१८४ मनुस्मृति। वेदमध्येष्यमाणश्च अन्नमश्नंश्च सर्वदा ॥ १३८ ॥ त्रिराचामेदपः पूर्वं द्विः प्रमृज्यात्ततो मुखम् । शारीरं शौचमिच्छन् हि स्त्रीशूद्रस्तु सकृत्सकृत् ॥ १३९॥ मल और मूत्र का त्याग करने पर लिङ्ग और योनि को एक बार, गुदा को तीन बार, वाम हाथ को दशवार, फिर दोनों हाथों को सातवार मिट्टी से धोना चाहिए । यह आचार-शौच गृहस्थों के लिए है । ब्रह्मचारियों को इससे दूना शौच करना चाहिए । वान- प्रस्थ आश्रमवालों को तिगुना और संन्यासियों को चौगुना क- रना चाहिए । मल-मूत्र करने के पीछे शुद्ध होकर, आचमन करे और नेत्र वगैरह का जल से स्पर्श करे । वेदपाठ के आरम्भ में और भोजन के समय में आचमन करे । पहले तीनबार आचमन, फिर दोबार मुख धोवे स्त्री और शूद्र एकवारही जल से आचमन करें। इस प्रकार शरीरशुद्धि होती है ॥ १३६-१३९ ॥ शूद्राणां मासिकं कार्यं वपनं न्यायवर्त्तिनाम् । वैश्यवच्छौचकल्पश्च द्विजोच्छिष्टं च भोजनम् ॥ १४०॥ नोच्छिष्टं कुर्वते मुख्या विप्रुषोऽङ्गे पतन्ति याः । न श्मश्रूणि गतान्यास्यान्न दन्तान्तरधिष्ठितम् ॥१४१॥ स्पृशन्ति बिन्दवः पादौ य आचामयतः परान् । भौमिकैस्ते समा ज्ञेया न तैराप्रयतो भवेत् ॥ १४२॥ उच्छिष्टेन तु संस्पृष्टो द्रव्यहस्तः कथञ्चन । अनिधायैव तद्द्रव्यमाचान्तः शुचितामियात् ॥ १४३॥ वान्तो विरिक्तः स्नात्वा तु घृतप्राशनमाचरेत् । आचामेदेव भुक्त्वाऽन्नं स्नानं मैथुनिनः स्मृतम्॥१४४॥ सुप्त्वा श्रुत्वा च भुक्त्वा च निष्ठीव्योक्त्वानृतानि च ।