मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका। ३१ यह अवश्य विज्ञेय है कि शब्द और अर्थ का नित्य संबन्ध है, तथा शब्द का दोष अर्थ में संक्रान्त होता है। अतएव शब्दनिष्ठ स्वर के भेद से अर्थ का भेद हो जाता है। यह बात शिक्षा-निरुक्त लिखित इस मन्त्र से स्पष्ट है। जैसा— ' मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्या प्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥ ' स्वर अथवा वर्ण से हीन, अतएव दोषग्रस्त होने से मिथ्या उच्चारित, मन्त्र-वाक्य; वास्तविक अर्थ को नहीं कहता है। वह मन्त्ररूप वज्र यजमान को मार देता है। जैसे स्वर के दोष से इन्द्रशत्रु मारा गया। आशय यह है कि पूर्व काल में इन्द्रने त्वष्टा के विश्वरूप नामक पुत्र को मारा, तब त्वष्टा क्रुद्ध होकर इन्द्रको मारनेवाले वृत्र नामक दूसरे पुत्र की कामना से आभिचारिक यज्ञ किया और ' इन्द्र का शत्रु होकर बढ़ो ' इस इच्छा से 'इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व' इस वाक्य का उच्चारण किया। उसमें षष्ठीतत्पुरुष समास के अनुसार अन्तोदात्त का उच्चारण करना था, परंतु प्रमाद से बहुव्रीहि समास के अनुसार आद्युदात्त का उच्चारण हो गया, जिसका विपरीत फल हुआ कि वृत्र को इन्द्रने मारा। अर्थात् ' इन्द्र- शत्रुः' इस पद का ' इन्द्रस्य शत्रुः ' ऐसा तत्पुरुष समास करने से ' इन्द्र का शत्रु.' यह अर्थ होता है; और ' इन्द्रः शत्रु- र्यस्य सः ' ऐसा बहुव्रीहि करने से ' इन्द्र है शत्रु (मारने वाला) जिसका ' यह अर्थ होता है। यह विषय वैयाकरणों में अति प्रसिद्ध है।