भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 339, कुल 649 में से

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पृष्ठ 339

भिक्षा को न जावे । केश, नख और दाढ़ी मूंछों को मुड़ाकर, भिक्षा- पात्र, दण्ड, कमण्डलु और रंगे वस्त्रों के सहित, किसी को दुःख न देकर, नियम से विचरा करे । संन्यासी के पात्र, सोना, चांदी आदि धातु के न हों, उन पात्रों की पवित्रता यज्ञपात्रों की भांति जल से ही होती है । तुंबी, काठ, मिट्टी या बांस का पात्र संन्या- सियों के लिए शास्त्र में लिखा है । इनको ' यतिपात्र ' कहते हैं ॥ ५०-५४ ॥ एककालं चरेद्भैक्षं न प्रसज्जेत विस्तरे । भैक्षे प्रसक्तो हि यतिर्विषयेष्वपि सज्जति ॥ ५५ ॥ विधूमे सन्नमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने । वृत्ते शरावसंपाते भिक्षां नित्यं यतिश्चरेत् ॥ ५६ ॥ अलाभे न विषादी स्याल्लाभे चैव न हर्षयेत् । प्राणयात्रिकमात्रः स्यान्मात्रासङ्गाद्विनिर्गतः ॥ ५७ ॥ अभिपूजितलाभांस्तु जुगुप्सेतैव सर्वशः । अभिपूजितलाभैश्च यतिर्मुक्तोऽपि बध्यते ॥ ५८ ॥ संन्यासी एकवार भिक्षा करे, अधिकवार भिक्षा न करे । क्योंकि अधिक भिक्षा से कामादि विषयों में मन लग जाता है । रसोई का धुंआ निकल गया हो, कूटना बंद हो चुका हो, आग बुझादी गई हो, सब भोजन करचुके हों, पात्र फेंक दिये हों तब भिक्षा करनी चाहिए । भिक्षा न मिलने पर खेद और मिलने पर आनन्द न माने, जीवनमात्र का उपाय करे । शब्द, स्पर्श आदि विषयों से रहित होवे । सत्कार के साथ मिली भिक्षाओं से घृणा करे, क्योंकि- ऐसी भिक्षाओं से मुक्त हुआ भी संन्यासी बन्धन में पड़ जाता है ॥ ५५-५८ ॥ अल्पान्नाभ्यवहारेण रहःस्थानासनेन च ।