भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 359, कुल 649 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 359

सातवां अध्याय। २१६ एषां हि बाहुगुण्येन गिरिदुर्गं विशिष्यते ॥ ७१ ॥ त्रीण्याद्यान्याश्रितास्तेषां मृगगर्ताश्रयाप्‌चराः । त्रीण्युत्तराणि क्रमशः प्लवङ्गमनरामराः ॥ ७२ ॥ यथा दुर्गाश्रितानेतान्नोपहिंसन्ति शत्रवः । तथारयो न हिंसन्ति नृपं दुर्गसमाश्रितम् ॥ ७३ ॥ एकः शतं योधयति प्राकारस्थो धनुर्धरः । शतं दशसहस्राणि तस्माद्दुर्गं विधीयते ॥ ७४ ॥ तत्स्यादायुधसंपन्नं धनधान्येन वाहनैः । ब्राह्मणैः शिल्पिभिर्यन्त्रैर्यवसेनोदकेन च ॥ ७५ ॥ तस्य मध्ये सुपर्याप्तं कारयेद्गृहमात्मनः । गुप्तं सर्वर्तुकं शुभ्रं जलवृक्षसमन्वितम् ॥ ७६ ॥ इन दुर्गों में गिरिदुर्ग श्रेष्ठ है। इसलिए सब यत्नों से उसका आश्रय ठीक है। उक्त दुर्गों में प्रथम तीन में क्रम से मृग, चूहा और नाक रहते हैं। बाक़ी तीनों में वानर, मनुष्य और देवता निवास करते हैं। जैसे इन दुर्गों में रहनेवाले मृगादि को कोई हिंसक नहीं मार सकते, ऐसे ही गिरिदुर्ग का आश्रय करनेवाले राजा को शत्रु नहीं मार सकते हैं। क़िले के भीतर रहनेवाला एक धनुर्धर सौ योद्धाओं से लड़ सकता है और सौ धनुर्धर दश हज़ार के साथ लड़ सकते हैं। इसीसे क़िला बनाया जाता है। वह क़िला हथियार, धन, धान्य, वाहन, ब्राह्मण, शिल्पविशारद, यन्त्र-कल, घास और जल से परिपूर्ण रक्खे। उस क़िले के बीच में, प्रयोजन भर के लिए एक मकान बनावे, जो सब ऋतुओं के फल-पुष्प युक्त, सफ़ेदी किया हुआ, जल और वृक्षों के सहित हो ॥ ७१-७६ ॥ तदध्यास्योद्वहेद्भार्यां सवर्णां लक्षणान्विताम् ।