मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४ मनुस्मृति । के रक्षार्थ जल्प-वितण्डा हैं । परंतु इस समय अपने अपने मतों के रक्षार्थ जल्प-वितण्डा का प्रयोग होता है । प्रसङ्गवश यह कहना पड़ता है कि चार्वाक, बौद्ध और जैन वेददूषक अवश्य हुये हैं, पर उनसे वैदिक धर्म पर ऐसा आघात नहीं पहुँचा कि जिसका प्रतीकार न हुआ हो। क्योंकि वे सब खुल्लमखुल्ला वेददूषक हुए इस कारण समय समयपर उनकी चिकित्सा भी होती गई । पर इस दुर्बल धार्मिक-संस्था में जो प्रच्छन्न (गुप्त) चार्वाक आदि प्रबल हो रहे हैं इनका शासन अतिकठिन क्या, बल्कि अशक्य सा होरहा है । इस शोचनीय दशा का उल्लेख विद्याँ (दार्शनिकनिबन्ध) में यों आया है— 'प्रत्यक्षीक्रियतेऽद्य वेदपुरुषो व्याख्याकशालाञ्चितो दृश्यन्ते स्मृतयोऽपि दुर्बलदशाः स्वेच्छा 'नियोगाङ्किताः ।' तर्कोद्भावनया पुराणघटनोपन्यासतां नीयते 'क्षुभ्यद्धर्ममृगान्तरेषु वलते शार्दूलविक्रीडितम् ॥ साध्यन्ते परमोहनाय शतधा साध्यानि वेदादितो वेदार्थेष्वपि साध्यभङ्गसमये श्रद्धाऽन्यथोत्पाद्यते । आपातामलवस्तुसंगतिकथाव्याजृम्भणाडम्बरै- राशूपाजितगौरवं प्रतिसभं निःशङ्कमाभाष्यते ॥ आस्तिक्यं प्रथयन्ति धर्मविषये भस्मोर्ध्वपुण्ड्रादिकै- रन्तर्ध्वस्तसमस्तशास्त्रविधयो नास्तिक्यमध्यासते । मन्ये प्राग्यत एव वेदविटपी शाखासहस्रं दधौ तस्मादेव धरामरेन्द्रकुलतः संप्रत्युपैत्यत्ययम् ॥ ' १ 'तत्त्वाध्यवसायसंरक्षणार्थं जलपवितण्डे बीजप्ररोहसंरक्षणार्थं कण्टकशाखा- वरणवत्' गौ० सू० २ यह निबन्ध उक्त पूज्यपाद श्रीद्विवेदी जी कृत है ।