भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 649 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 364

२२४ · मनुस्मृति । रक्षितं वर्धयेद्वृद्ध्या वृद्धं दानेन निक्षिपेत् ॥ १०१ ॥ नित्यमुद्यतदण्डः स्यान्नित्यं विवृतपौरुषः । नित्यं संवृतसर्वार्थो नित्यं छिद्रानुसार्थरेः ॥ १०२ ॥ जो पदार्थ नहीं मिला है उसके लेने की इच्छा, मिले हुए की रक्षा करे। जो रक्षित है, उसको बढ़ावे और बढ़े पदार्थ सुपात्रों को देवे । यह चार प्रकार का पुरुषार्थ है । आलस्य छोड़ कर, नित्य भली भांति इसका अनुष्ठान किया करे । जो नहीं प्राप्त है, उसको दण्ड- सेना से जीतने की इच्छा करे, प्राप्त वस्तु की देख भाल से रक्षा करे, रक्षित का व्यापार-उद्यम से वृद्धि करे और बढ़ी वस्तु शास्त्रा- नुसार, सुपात्र को देवे । राजा अपराधियों के लिए दण्ड उद्यत रक्खे, पुरुषार्थ को ठीक रक्खे, अपने अर्थों को गुप्त रक्खे और शत्रु के छिद्रों को देखा करे ॥ ६६-१०२ ॥ नित्यमुद्यतदण्डस्य कृत्स्नमुद्विजते जगत् । तस्मात्सर्वाणि भूतानि दण्डेनैव प्रसाधयेत् ॥ १०३ ॥ अमाययैव वर्तेत न कथंचन मायया । बुध्येतारिप्रयुक्तां च मायां नित्यं स्वसंवृतः ॥ १०४ ॥ नास्यच्छिद्रं परो विद्याद्विद्याच्छिद्रं परस्य तु । गूहेत्कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद्विवरमात्मनः ॥ १०५ ॥ बकवच्चिन्तयेदर्थान् सिंहवच्च पराक्रमेत् । वृकवच्चावलुम्पेत शशवच्च विनिष्पतेत् ॥ १०६ ॥ सदा उद्यत दण्डवाले राजा से, सारा जगत् डरता है । इसलिए दण्ड ही से सब प्राणियों को स्वाधीन रक्खे। छल से कोई व्यवहार न करे । अपनी रक्षा करता रहे और शत्रु के छलों को जानता रहे । ऐसा उपाय करे जिसमें अपना छिद्र-दोष शत्रु न जाने । परन्तु शत्रु