मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 371, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंसातवां अध्याय। २३१ विक्रोशन्त्यो यस्य राष्ट्राद् ध्रियन्ते दस्युभिः प्रजाः । संपश्यतः सभृत्यस्य मृतः स न तु जीवति ॥ १४३ ॥ क्षत्रियस्य परोधर्मः प्रजानामेव पालनम् । निर्दिष्टफलभोक्ता हि राजा धर्मेण युज्यते ॥ १४४ ॥ अपने सब कर्त्तव्यों को इस तरह पूरा कर के, प्रमाद-रहित और कार्यपरायण होकर अपनी प्रजा की रक्षा करे । राजा और उसके कर्मचारियों के देखते यदि चोर, लुटेरे प्रजा को लूट पाट से दुःख पहुंचावें, तो वह राजा मरा सा है, जीता नहीं है। प्रजा का पालन करना ही क्षत्रिय का मुख्य धर्म है। इसलिए अपने धर्म ही से प्राप्त हो फल भोग करना उचित है ॥ १४२-१४४ ॥ उत्थाय पश्चिमे यामे कृतशौचः समाहितः । हुताग्निर्ब्राह्मणांश्चार्च्य प्रविशेत्सशुभां सभाम् ॥ १४५॥ तत्र स्थितः प्रजाः सर्वाः प्रतिनन्द्य विसर्जयेत् । विसृज्य च प्रजाः सर्वा मन्त्रयेत्सह मन्त्रिभिः ॥ १४६॥ गिरिपृष्ठं समारुह्य प्रासादं वा रहोगतः । अरण्ये निःशलाके वा मन्त्रयेदविभावितः ॥ १४७॥ यस्य मन्त्रं न जानन्ति समागम्य पृथग्जनाः । सकृत्स्नां पृथिवीं भुङ्क्ते कोशहीनोऽपि पार्थिवः ॥ १४८ ॥ जडमूकन्धबधिरान्तिर्यग्योनान्र्वयोऽतिगान् । स्त्रीम्लेच्छव्याधितव्यङ्गान् मन्त्रकालेऽपसारयेत् ॥ १४६॥ राजा बड़े तड़के उठकर, शौच से निपटकर, एकाग्र चित्त होकर अग्निहोत्र और ब्राह्मणसत्कार करके, राजसभा में प्रवेश करे । वहां दर्शकों को प्रीतिपूर्वक पहले बिदा करके फिर मन्त्रियों के साथ