मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[header] सातवां अध्याय । २३६ [/header]
वराहमकराभ्यां वा सूच्या वा गरुडेन वा ॥ १८७ ॥ यतश्च भयमाशङ्केत्ततो विस्तारयेद्बलम् । पद्मेन चैव व्यूहेन निविशेत सदा स्वयम् ॥ १८८ ॥ सेनापतिबलाध्यक्षौ सर्वदिक्षु निवेशयेत् । यतश्च भयमाशङ्केत्प्राचीं तां कल्पयेद्दिशम् ॥१८६॥ राजा, दण्डव्यूह † से मार्ग में चले अथवा शकट, वराह, मकर, सूई, गरुड़ के तुल्य आकार वाले व्यूहों में, जहां जैसा देखे वैसी यात्रा करे। जिस तरफ़ डर जाने, उधर सेना बढ़ावे और खुद पद्माकार व्यूह में सदा रहे । सेनापति और सेनानायकों को सब दिशाओं में नियुक्त करे और जिस दिशा में भय समझे उसे पूर्वदिशा मान लेवे ॥ १८७-१८६ ॥ गुल्मांश्च स्थापयेदाप्तान् कृतसंज्ञान् समन्ततः । स्थानयुद्धे च कुशलानभीरूनविकारिणः ॥ १६०॥ संहतान्योधयेदल्पान् कामं विस्तारयेद्बहून् । सूच्या वज्रेण चैवैतान् व्यूहेन व्यूह्य योधयेत् ॥१६१॥ स्यन्दनाश्वैः समे युद्ध्येदनूपे नौद्विपैस्तथा । वृक्षगुल्मावृते चापैरसिचर्मायुधैः स्थले ॥ १६२ ॥ कुरुक्षेत्रांश्च मत्स्यांश्च पञ्चालान् शूरसेनजान् । दीर्घाल्लघूंश्चैव नरानग्रानीकेषु योजयेत् ॥ १६३ ॥
† दण्डा के समान फौज रखना, दण्डव्यूह ऐसे ही शकटव्यूह वगैरह । ऐसी व्यूहरचना में आगे सेनापति, बीच में राजा, पीछे, सेनापति, दोनों बगल हाथी, उनके पास घोड़े और उनके आसपास में पैदल, इस तरह लम्बा जमाव दण्डव्यूह कहा जाता है।