भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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पृष्ठ 383

सातवां अध्याय । २४३ प्राज्ञं कुलीनं शूरं च दक्षं दातारमेव च । कृतज्ञं धृतिमन्तं च कष्टमाहुररिं बुधाः ॥ २१० ॥ आर्यता पुरुषज्ञानं शौर्यं करुणवेदिता । स्थौललक्ष्यं च सततमुदासीनगुणोदयः ॥ २११ ॥ क्षेम्यां सस्यप्रदां नित्यं पशुवृद्धिकरीमपि । परित्यजेन्नृपो भूमिमात्मार्थमविचारयन् ॥ २१२ ॥ आपदर्थं धनं रक्षेद्दारान् रक्षेद्धनैरपि । आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ॥ २१३ ॥ धर्मज्ञ, कृतज्ञ, प्रसन्नचित्त, प्रीति करनेवाला, स्थिर कार्य का आरम्भ करनेवाला, छोटा मित्र अच्छा होता है । बुद्धिमान्, कुलीन, शूर, चतुर, दाता, कृतज्ञ और धैर्यवान् शत्रु को लोग कठिन कहते हैं । सभ्यता, पुरुषों की पहिचान, शूरता, दयालुता और उदारता ये सब उदासीन राजा के गुण हैं । कल्याण करनेवाली, संपूर्ण धान्यों को देनेवाली और पशुवृद्धि करनेवाली भूमि को भी राजा अपने प्राणों की रक्षा के लिए विना विचार किये छोड़ देवे । आपत्ति दूर करने के लिए धन की करे, धन से स्त्रियों की रक्षा करे और धन, स्त्री से भी अपने शरीर की रक्षा करे ॥ २०६–२१३ ॥ । ॥ २२६ ॥ सह सर्वाः समुत्पन्नाः प्रसमीक्ष्यापदो ऽयां संहितायां संयुक्तांश्च वियुक्तांश्च सर्वोपायान्स्तृ ॥ उपेतारमुपेयं च सर्वोपायांश्च कृत्स्र अपना नित्यकर्म यथावत एतन्त्रयं समाश्रित्य प्रयतेतार्थसिद्ध संपूर्ण राजकार्यों का स्वयं होजाय तो अपने अधिका- एवं सर्वमिदं राजा सह संमन्त्र्य २५–२२६ ॥ व्यायाम्याप्लुत्यमध्याह्नेभोक्तुमन्तः पूरा हुआ।