मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 393, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवां अध्याय । २५३ जातिजानपदान्धर्मान् श्रेणीधर्मांश्च धर्मवित् । समीक्ष्य कुलधर्मांश्च स्वधर्मं प्रतिपादयेत् ॥ ४१ ॥ स्वानि कर्माणि कुर्वाणा दूरे सन्तोऽपि मानवाः । प्रिया भवन्ति लोकस्य स्वे स्वे कर्मण्यवस्थिताः॥४२॥ नोत्पादयेत्स्वयं कार्यं राजा नाप्यस्य पूरुषः। न च प्रापितमन्येन ग्रसेदर्थं कथञ्चन ॥ ४३ ॥ भूमि का स्वामी और रक्षक होने से राजा गड़ा धन और धातु की खानों के आधे भाग का अधिकारी है। चोरों का चुराया हुआ धन छीन कर जिस वर्ण का हो उन सब को दे देय। यदि आप ग्रहण करे तो चोर के पाप का स्वयं भागी होता है। जातिधर्म, देशधर्म, श्रेणीधर्म (व्यापार) और कुलधर्म के अनु- सार अर्थात् रिवाज के अनुसार राजा राजधर्म को प्रचलित करे। जाति, देश और कुलधर्म और अपने कर्मों को करते लागे दूर रहते भी लोक में प्रिय होते हैं। राजा वा राजपुरुष जो नालिश न करता हो उससे खुद नालिश न करवावें और कोई झगड़ा पेश करे तो उसमें आनाकानी न करे ॥ ३६-४३ ॥ यथा नयत्यसृक्पातैर्मृगस्य मृगयुः पदम् । नयेत्तथानुमानेन धर्मस्य नृपतिः पदम् ॥ ४४ ॥ सत्यमर्थं च संपश्येदात्मानमथ साक्षिणः । देशं रूपं च कालं च व्यवहारविधौ स्थितः ॥ ४५ ॥ सद्भिराचरितं यत्स्याद्धार्मिकैश्च द्विजातिभिः । तद्देशकुलजातीनामविरुद्धं प्रकल्पयेत् ॥ ४६ ॥ जैसे वधक ज़मीन पर गिरे रुधिर के बूंदों से मारे हुए मृग का घर खोज लेता है। वैसे राजा अनुमान से मामला की अस-