भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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पृष्ठ 408

२६८ मनुस्मृति । अधर्मदण्डनं लोके यशोघ्नं कीर्तिनाशनम् । अस्वर्ग्यं च परत्रापि तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥ १२७ ॥ अदण्ड्यान्दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन् । अयशो महदाप्नोति नरकं चैव गच्छति ॥ १२८ ॥ वाग्दण्डं प्रथमं कुर्याद्धिग्दण्डं तदनन्तरम् । तृतीयं धनदण्डं तु वधदण्डमतः परम् ॥ १२६ ॥ वधेनापि यदा त्वेतान्निग्रहीतुं न शक्नुयात् । तदैषु सर्वमप्येतत्प्रयुञ्जीत चतुष्टयम् ॥ १३० ॥ अन्याय से दण्ड देना, इस लोक में यश और कीर्ति का नाशक है। परलोक का बाधक है। निरपराधियों को दण्ड और अपरा- धियों को दण्ड न देने से राजा की बड़ी अकीर्ति होती है। अयश मिलता है और नरक में पड़ता है। प्रथम अपराध में वाग्दण्ड-स- मझा देय, फिर अपराध करे तो धिक्कार-लानत दे। उसके बाद करे तो जुर्माना करे। फिर भी करे तो शरीर दण्ड देवे। जब देह दण्ड से भी अपराधियों को वश में न कर सके तो इन चारों दण्डों का प्रयोग करे ॥ १२७-१३०॥ लोकसंव्यवहारार्थं याः संज्ञाः प्रथिता भुवि । ताम्ररूप्यसुवर्णानां ताः प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ १३१ ॥ जालान्तरगते भानौ यत्सूक्ष्मं दृश्यते रजः । प्रथमं तत्प्रमाणानां त्रसरेणुं प्रचक्षते ॥ १३२ ॥ लोक में व्यवहार के लिये सोना, चांदी आदि की जो संज्ञा माप-तौल प्रसिद्ध है वह यहां कही जाती है:—मकान के झरोखे से आनेवाली सूर्यकिरणों में जो छोटे छोटे धूल के कण दिखलाई देते हैं वह प्रथम मान है उसको त्रसरेणु कहते हैं ॥ १३१-१३२ ॥