भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 414, कुल 649 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 414

२७४ : मनुस्मृति । मत्तोन्मत्तार्ताध्यधीनर्बालेन स्थविरेण वा । असंबंधकृतश्चैव व्यवहारो न सिध्यति ॥ १६३ ॥ सत्या न भाषा भवति यद्यपि स्यात्प्रतिष्ठिता । बहिश्चेद्भाष्यते धर्मान्नियताद्व्यावहारिकात्॥ १६४॥ ज़मानत का धन, फ़िजूल दान, जुये का रुपया, मद्य का रुपया और जुर्माना का रुपया पिता के मरने पर उसके बदले, पुनः नहीं दे सकता । सिर्फ़ हाज़िर करने की ज़मानत में पहली बात जाने । परन्तु ऋणी के बदले में क़र्ज़ अदा करने की ज़मानत वाला मर जाय तो उसके वारिसों से भी दिलावे । क़र्ज़दार क़र्ज़ न दे और ज़ामिन मरजाय तो महाजन कैसे अपना रुपया वसूल करे ? किसी से नहीं। यदि ज़ामिन को ऋणी रुपया सौंप गया हो और उसके पास भी खूब धन हो तो ज़मानती के मरने पर उसका पुत्र ऋण चुकावे—यह धर्मशास्त्र की मर्यादा है। नशाबाज़, पागल, दुःखी, पराधीन, बालक, बुड्ढा और सामर्थ्य के बाहर प्रतिज्ञा करनेवाले का व्यवहार ठीक नहीं माना जाता । आपस की लिखा- पढ़ी या ज़बानी ठहरी भी कोई बात यदि धर्म—क़ानून और रिवाज़ के खिलाफ़ हो तो सच्ची नहीं मानी जाती ॥ १५६-१६४ ॥ योगाधमनविक्रीतं योगदानप्रतिग्रहम् । यत्र वाप्युपधिं पश्येत्तत्सर्वं विनिवर्तयेत् ॥ १६५ ॥ ग्रहीता यदि नष्टः स्यात्कुटुम्बार्थे कृतो व्ययः । दातव्यं बान्धवैस्तत्स्यात्प्रविभक्तैरपि स्वतः ॥ १६६ ॥ कुटुम्बार्थेऽप्यधीनोऽपि व्यवहारं यमाचरेत् । स्वदेशे वा विदेशे वा तं ज्यायान्न विचालयेत् ॥ १६७॥ कपट से किया हुआ बन्धक ( गिरवी ) विक्रय, दान, प्रतिग्रह और निक्षेप—धरोहर कोभी लौटा देना चाहिए। यदि ऋणी मर