भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 649 में से

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भूमिका । ४१ व्यास ने ये सोलह संस्कार कहे हैं— ‘ गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तो जातकर्म च । नामक्रिया-निष्क्रमणेऽन्नाशनं वपनक्रिया ॥ कर्णवेधो व्रतादेशो वेदारम्भक्रियाविधिः । केशान्तः स्नानमुद्वाहो विवाहाग्निपरिग्रहः ॥ त्रेताग्निसंग्रहश्चेति संस्काराः षोडश स्मृताः । नवैताः कर्णवेधान्ता मन्त्रवर्जं क्रियाः स्त्रियः ॥ विवाहो मन्त्रतस्तस्याः शूद्रस्यामन्त्रतो दश ॥’ इनमें गर्भाधानादि विवाहान्त चौदह संस्कार, पंद्रहवां स्मार्त्त अग्न्याधान, सोलहवां श्रौत अग्न्याधान है । सारांश यह है कि अपने अपने कल्पसूत्र ( स्मार्त्तसूत्र श्रौत सूत्रों) के अनुसार अधिक अथवा न्यून जितने संस्कार प्राप्त होवें उनका ही करना योग्य है । और पहिले जो संस्कारों की अधिक वा न्यून संख्या लिखी है वह सब वैदिक शाखा सूत्रों के भेद से है । इसीलिये गोत्र, प्रवर के समान शाखा- सूत्र का भी स्मरण रखना अत्यावश्यक है । नहीं तो किस किस वाक्य के अनुसार संस्कार किया जायगा । सर्वथा संस्कार का उच्छेद होगा या दूसरे का बेटा बनना पड़ेगा । उक्त व्यवस्था में यह गृह्यपरिशिष्टकार का वाक्य है— ‘ बह्वल्पं वा स्वगृह्योक्तं यस्य यावत् प्रकीर्तितम् । तस्य तावति शास्त्रार्थे कृते सर्वः कृतो भवेत् ॥’ इसी प्रकार कात्यायन का वाक्य है— ‘ ऊनो वाऽप्यतिरिक्तो वा यः स्वशाखास्थितो विधिः । तेन संतनुयाद् यज्ञं न कुर्यात् पारशाखिकम् ॥