भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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२६० मनुस्मृति । शिरोभिस्ते गृहीत्वोर्वीं स्रग्विणो रक्तवाससः । सुकृतैः शापिताः स्वैः स्वैर्नयेयुस्ते समञ्जसम् ॥ २५६ ॥ यथोक्तेन नयन्तस्ते पूयन्ते सत्यसाक्षिणः । विपरीतं नयन्तस्तु दाप्याः स्युर्द्विशतं दमम् ॥ २५७ ॥ साक्ष्याभावे तु चत्वारो ग्रामाः सामन्तवासिनः । सीमाविनिर्णयं कुर्युः प्रयता राजसन्निधौ ॥ २५८ ॥ सामन्तानामभावे तु मौलानां सीम्नि साक्षिणाम् । इमानप्यनुयुञ्जीत पुरुषान्वनगोचरान् ॥ २५६ ॥ व्याधाञ्छाकुनिकान्गोपान्कैवर्तान्मूलखानकान् । व्यालग्रहानुञ्छवृत्तीनन्यॉंश्च वनचारिणः ॥ २६० ॥ ते पृष्टास्तु यथा ब्रूयुः सीमां संधिषु लक्षणम् । तत्तथा स्थापयेद्राजा धर्मेण ग्रामयोर्द्वयोः ॥ २६१ ॥ वे लोग पूँछने पर जैसा कहें उसीके मुताबिक सीमा बांधे और उन पञ्चों का नाम लिखले । वे साक्षी लाल फूलों की माला, लाल वस्त्र पहनकर शिर पर मिट्टी का ढेला रखकर अपने अपने पुण्य की शपथ खाकर ठीक बात कहें । वे सत्य साक्षी यथार्थ निर्णय करने से निष्पाप होते हैं और असत्य निर्णय करें तो दो सौ पण दण्ड उन पर करे । यदि साक्षियों का अभाव हो तो आसपास के चार ज़मींदार धर्म से राजा के सामने सीमा निर्णय करें । यदि ज़मींदार और गांव के पुराने वाशिन्दा सीमा के साक्षी न मिलें तो वनमें रहनेवाले मनुष्यों से पूंछे । व्याध, चिड़ीमार, ग्वाल, मछुए, जड़ खोदनेवाले, कना बीनकर जीनेवाले आदि मनुष्यों से सब बातें निश्चित करे । वे लोग जैसा बतलावें उसी भांति राजा दो गावोंके बीच सीमाका स्थापन करे ॥ २५५-२६१ ॥