मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६८ मनुस्मृति । यदधीते यद्यजते यद्ददाति यदर्चति । तस्य षड्भागभाद्राजा सम्यग्भवति रक्षणात्॥३०५॥ रक्षन् धर्मेण भूतानि राजा वध्यांश्च घातयन् । यजतेऽहरहर्यज्ञैः सहस्रशतदक्षिणैः॥ ३०६ ॥ योऽरक्षन् बलिमादत्ते करं शुल्कं च पार्थिवः । प्रतिभा गं च दण्डं च स सद्यो नरकं व्रजेत् ॥ ३०७ ॥ अरक्षितारं राजानं बलिषड्भागहारिणम् । तमाहुः सर्वलोकस्य समग्रमलहारकम् ॥ ३०८ ॥ जो राजा अभय देता है वह सदा पूज्य है। उस अभय-दक्षिणा देनेवाले का राज्य खूब बढ़ता है । जो रक्षा करता है उस राजा का सब के धर्म से छठा भाग होता है और जो रक्षा नहीं करता उसका सबके अधर्म में से छठा भाग होता है । जो रक्षाशील है वह प्रजा मैं जो वेद पढ़ता है, यज्ञ करता है, दान देता है, पूजा- पाठ करता है, सब के छठे भाग का फल पाता है । प्रतिदिन प्रा- णियों की धर्म से रक्षा और दुष्टों को दण्ड देने से मानो राजा लाखों रुपया की दक्षिणा का यज्ञ कर रहा है और जो राजा प्रजापालन न करके भेंट कर आदि लेता है वह शीघ्रही नरक- गामी होता है । इस प्रकार का राजा अन्न का छठा भाग जो लेता है वह सब लोगों का पाप लेनेवाला कहलाता है ॥ ३०५-३०८ ॥ अनपेक्षितमर्यादं नास्तिकं विप्रलुम्पकम् । अरक्षितारमत्तारं नृपं विद्यादधोगतिम् ॥ ३०६ ॥ अधार्मिकं त्रिभिर्न्यायैर्निगृह्णीयात्प्रयत्नतः । निरोधनेन बन्धेन विविधेन वधेन च ॥ ३१० ॥ धर्ममर्यादा से रहित, नास्तिक, प्रजा धन ठगनेवाला और विना प्रजापालन कर लेनेवाला राजा नरकगामी होता है ।