मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४४ मनुस्मृति ।
( १७ ) पौष मास के रोहिणी नक्षत्र में वा कृष्णाष्टमी में उत्सर्ग । .... .... .... इत्यादि । इसी प्रकार माध्यंदिनी शाखावालों को कात्यायन श्रौत सूत्रानुसार अग्न्याधानादि श्रौतकर्म करना चाहिये । ( १ ) अग्न्याधान । इसका आरम्भ ब्राह्मण-द्विज वसन्त ऋतु में, क्षत्रिय-द्विज ग्रीष्मऋतु में, वैश्य-द्विज शरद् ऋतु में करते हैं । अग्न्याधान में अध्वर्यु, होता, उद्गाता और ब्रह्मा ये चार ऋत्विक् होते हैं । अग्न्याधान-शाला में पश्चिम की ओर 'गार्हपत्य' नाम अग्नि का वृत्ताकार कुण्ड होता है । इस से पूर्व की ओर 'आहवनीय' नाम अग्नि का चतुरस्र कुण्ड होता है । दक्षिण की ओर 'अन्वाहार्यपचन' नाम अग्नि का वृत्तार्धाकार कुण्ड होता है । गार्हपत्य और आहवनीय कुण्ड के अन्तराल भूमि में एक विशिष्ट वेदिका बनाई जाती है, जिसका पूर्व भाग 'अंश' पश्चिम भाग 'श्रोणि' कहलाता है । ( २ ) अग्निहोत्र । यह सायं और प्रातः वेदमन्त्र से जो अग्नि में आहुति दी जाती है उस कर्म का नाम है । ' यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासत । एवं, सर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासते ॥ ' ( छां. उ. ) ( ३ ) दर्शपौर्णमास । यह इष्टि आहिताग्नि ( अग्न्याधान- कर्ता ) को प्रतिमास करना पड़ता है .... इत्यादि । इसी प्रकार आश्वलायन-शाङ्खायन आदि सूत्रों के अनुसार ऋग्वेदियों के कर्म; आपस्तम्ब-हिरण्यकेशीय-सत्याषाढ
१-स्मार्त कर्म में ' अष्टका ' आदि कतिपय कर्म और श्रौतकर्म में आगिले सभी भाग छोड़ दिये हैं । उनमें राजसूय, अश्वमेध क्षत्रिय के विषय हैं ।