भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 476, कुल 649 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 476

३३६ मनुस्मृति । एष स्त्रीपुंसयोरुक्तो धर्मो वो रतिसंहितः । आपद्यपत्यप्राप्तिश्च दायभागं निबोधत ॥ १०३ ॥ स्त्री-पुरुष विवाह करके ऐसा व्यवहार करें, जिसमें धर्माचरण में अलग न हों। यह स्त्री-पुरुषों का धर्म और आपत्काल में सन्तान- विधि कही गई है। अब दायभाग की व्यवस्था सुनो ॥१०२-१०३ ॥ ऊर्ध्वं पितुश्च मातुश्च समेत्य भ्रातरः समम् । भजेरन् पैतृकं रिक्थमनीशास्ते हि जीवतोः ॥१०४॥ ज्येष्ठ एव तु गृह्णीयात्पित्र्यं धनमशेषतः । शेषास्तमुपजीवेयुर्यथैव पितरं तथा ॥ १०५ ॥ ज्येष्ठेन जातमात्रेण पुत्री भवति मानवः । पितॄणामनृणश्चैव स तस्मात् सर्वमर्हति ॥ १०६ ॥ यस्मिन्नृणं संनयति येन चानन्त्यमश्नुते । स एव धर्मजः पुत्रः कामजानितरान् विदुः ॥ १०७ ॥ पितेव पालयेत्पुत्रान्ज्येष्ठो भ्रातॄन् यवीयसः । पुत्रवच्चापि वर्तेरञ्ज्येष्ठे भ्रातरि धर्मतः ॥ १०८ ॥ ज्येष्ठः कुलं वर्धयति विनाशयति वा पुनः । ज्येष्ठः पूज्यतमो लोके ज्येष्ठः सद्भिरगर्हितः ॥ १०६ ॥ दायभाग-व्यवस्था । पिता और माता की मृत्यु के बाद, भाई आपस में पिता की सम्पत्ति बाँट ले, पर उनके जीते नहीं बाँट सकते। बड़ा भाई पिता का सब धन ग्रहण करे और शेष भाई जैसे पिता की आशा में जी- विका करते थे, वैसेही भाई के वश में रहकर करें । बड़े पुत्र का जन्म होने से मनुष्य पुत्रवान् होता है और पितृऋण से छूटता है,