भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 478, कुल 649 में से

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३३८ मनुस्मृति । छोटा भाई इस प्रकार अपना भाग लें और दूसरे भाइयों का मध्यम भाग होना चाहिए ॥ ११०-११३ ॥ सर्वेषां धनजातानामाददीताग्रयमग्रजः । यच्च सातिशयं किंचिदशतश्चाप्नुयाद्वरम् ॥ ११४ ॥ उद्धारो न दशस्त्वस्ति संपन्नानां स्वकर्मसु । यत्किञ्चिदेव देयं तु ज्यायसे मानवर्धनम् ॥ ११५ ॥ एवं समुद्धृतोद्धारे समानांशान् प्रकल्पयेत् । उद्धारेऽनुद्धृते त्वेषामियं स्यादंशकल्पना ॥ ११६ ॥ एकाधिकं हरेज्ज्येष्ठः पुत्रोऽप्यर्धं ततोऽनुजः । अंशमंशं यवीयांस इति धर्मो व्यवस्थितः ॥ ११७ ॥ बड़ाभाई गुणवान् हो और दूसरे गुणहीन हों तो सब सम्पत्ति में जो श्रेष्ठ वस्तु हैं उनको बड़ाभाई पावे और गौ वगैरह दश—प- शुओं में जो श्रेष्ठ हो उसको भी पावे। यदि सब भाई गुणी हों तो बड़े भाई को दशमें से श्रेष्ठ वस्तु न देकर, उसके सम्मानार्थ कुछ वस्तु अधिक देवे। इस प्रकार बीसवां भाग निकालकर बाक़ी का बराबर भाग करे । और बीसवां अलग न किया हो तो इसभांति करे—बड़ाभाई दो भाग उससे छोटा ड्योढ़ा और उससे छोटे भाई सब एक एक भाग लें—यह मर्यादा है ॥ ११४-११७ ॥ स्वेभ्योऽशेभ्यस्तु कन्याभ्यः प्रदद्युर्भातरः पृथक् । स्वात्स्वाद्दंशाच्चतुर्भागं पतिताः स्युरदित्सवः ॥११८॥ अजाविकं सैकशफं न जातु विषमं भजेत् । अजाविकं तु विषमं ज्येष्ठस्यैव विधीयते ॥ ११९ ॥ यवीयाञ्ज्येष्ठभार्यायां पुत्रमुत्पादयेदिति । समस्तत्र विभागः स्यादिति धर्मो व्यवस्थितः॥१२०।

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