मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४४ मनुस्मृति । त्र्यंशं दायाद्धरेद्विप्रो द्वावंशौ क्षत्रियासुतः । वैश्याजः सार्धमेवांशमंशं शूद्रासुतो हरेत् ॥ १५१ ॥ सर्वं वा रिक्थजातं तद्दशधा परिकल्प्य च । धर्म्यं विभागं कुर्वीत विधिनानेन धर्मवित् ॥ १५२ ॥ चतुरोंशान् हरेद्विप्रस्त्रीनंशान् क्षत्रियासुतः । वैश्यापुत्रो हरेद् द्वयंशमंशं शूद्रासुतो हरेत् ॥ १५३ ॥ यद्यपि स्यात्तु सत्पुत्रोऽप्यसत्पुत्रोऽपि वा भवेत् । नाधिकं दशमाद्दद्याच्छूद्रापुत्राय धर्मतः ॥ १५४ ॥ ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्रापुत्रो न रिक्थभाक् । यदेवास्य पिता दद्यात्तदेवास्य धनं भवेत् ॥ १५५ ॥ खेती का बैल, सांड़, सवारी का घोड़ा, गहना, रहने का स्थान और जो क़ीमती चीज़ हो उनको ब्राह्मणी के पुत्र को देवे। ब्राह्मणी का पुत्र धन में तिहाई ले, क्षत्रिया का दो भाग, वैश्या का डेढ़ भाग और शूद्रा का एक भाग ले । अथवा सब सम्पत्ति का दश भाग करके धर्मज्ञ पुरुष धर्मानुसार यों भाग करे—ब्राह्मणीपुत्र को चार भाग, क्षत्रियापुत्र को तीन भाग, वैश्यापुत्र को दो भाग और शूद्रापुत्र को एक भाग दे । यद्यपि सत्पुत्र हो वा असत्पुत्र हो पर धर्म से शूद्रापुत्र को दशभाग से अधिक न दे । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के शूद्रा से पुत्र हो तो वह धन का भागी नहीं होता। जो कुछ पिता उसको दे वही उसका धन होगा ॥ १५०-१५५ ॥ समवर्णासु ये जाताः सर्वे पुत्रा द्विजन्मनाम् । उद्धारं ज्यायसे दत्त्वा भजेरन्नितरे समम् ॥ १५६ ॥ शूद्रस्य तु सवर्णैव नान्या भार्या विधीयते । तस्यां जाताः समांशाः स्युर्यदि पुत्रशतं भवेत् ॥ १५७ ॥