भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 486, कुल 649 में से

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पृष्ठ 486

३४६ मनुस्मृति । औरस, क्षेत्रज, दत्तक, कृत्रिम, गूढोत्पन्न और अपविद्ध ये छः दा- याद (सम्पत्ति के भागी) बान्धव हैं। कानीन, सहोढज, क्रीतक, पौनर्भव, स्वयंयत्त और शौद्र ये छः अदायाद—अवान्धव हैं। टूटी- फूटी नांव से जल तैरता हुआ जैसा फल पाता है, वैसाही फल कु- पुत्रों से नरकपार होने में पिता आदि को मिलता है। यदि अपुत्र के क्षेत्र में नियोगविधि से एक पुत्र हो, और किसी प्रकार दूसरा औरस पुत्र भी हो जाय तो दोनों क्षेत्रज—औरस अपने अपने पिताकी सम्पत्ति के भागी हैं। एक औरस पुत्रही पिता के धन का भागी होता है। शेष को दयावश, अन्न-वस्त्र देना चाहिए। औरस पुत्र पिताकी सम्पत्ति का विभाग करे तो क्षेत्रज को छठवां या पां- चवां भाग देवे। औरस और क्षेत्रज उक्त रीति से पितृधन के अधिकारी हैं। बाक़ी दश पुत्र, क्रम से गोत्रधन के भागी हैं ॥ १५८-१६५ ॥ स्वक्षेत्रे संस्कृतायां तु स्वयमुत्पादयेद्धि यम् । तमौरसं विजानीयात् पुत्रं प्रथमकल्पितम् ॥ १६६ ॥ यस्तल्पजः प्रमीतस्य क्लीबस्य व्याधितस्य वा । स्वधर्मेण नियुक्तायां स पुत्रः क्षेत्रजः स्मृतः ॥ १६७ ॥ माता पिता वा दद्यातां यमद्भिः पुत्रमापदि । सदृशं प्रीतिसंयुक्तं स ज्ञेयो दत्रिमः सुतः ॥ १६८ ॥ सदृशं तु प्रकुर्याद्यं गुणदोषविचक्षणम् । पुत्रं पुत्रगुणैर्युक्तं स विज्ञेयश्च कृत्रिमः ॥ १६६ ॥ उत्पद्यते गृहे यस्य न च ज्ञायेत कस्य सः । स गृहे गूढ उत्पन्नस्तस्य स्याद्यस्य तल्पजः ॥ १७० ॥ मातापितृभ्यामुत्सृष्टं तयोरन्यतरेण वा । यं पुत्रं परिगृह्णीयादपविद्धः स उच्यते ॥ १७१ ॥