मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें• भूमिका । ३ मानं तु लिङ्-लोट्-मुखभावनया सा चोदनैवात्र वरीवृतीति ॥ ' दूसरा नियम— ' यो धर्मः तत्र चोदना प्रमाणमेव ' जो धर्म है उसमें विधिवाक्य प्रमाण ही है। इससे 'वेदों के रहस्य को न जानकर उसपर जो जो दोष ठहराये हैं वा ठहराये जाते हैं वे सब व्यर्थ हैं ' यह बात सिद्ध हुई। इस दूसरे नियम के फल को दिखलानेवाला औत्पत्तिकसूत्र है—' औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन संबन्धस्तस्य ज्ञानमुपदेशोऽव्यतिरेकश्चार्थे- ऽनुपलब्धे तत्प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षत्वात् ' ( मी० द० १ । १ । ५) अर्थ-पूर्वपक्ष-पुरुष जिस शब्दमें जिस अर्थ का संकेत करता है उस शब्द से उस अर्थ का ज्ञान होता है, इस कारण शब्द और अर्थ का जो संकेतरूप संबन्ध है उसके पुरुषकृत होने से जैसा शब्द का प्रत्यक्ष ज्ञान, सीप में रजत- ज्ञान को; रस्सी में सर्पज्ञान को; तथा मृगतृष्णा में जलज्ञान को उत्पन्न करने से विपर्यय (मिथ्याभाव ) को प्राप्त होता है ऐसा शब्द में भी विपर्ययज्ञान संभव है। इस कारण विधिवाक्य धर्म के विषय में प्रमाण नहीं हो सकते । सिद्धान्त-शब्द का अर्थ के साथ शक्तिरूपसंबन्ध नित्यही है; किन्तु कृतक नहीं है। वह धर्म का कारण है। अतएव प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से अप्राप्त अर्थ में विधिवाक्य व्यभिचार को नहीं प्राप्त होता। इस कारण प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों की अपेक्षा न रखने से (वह) विधिवाक्य धर्म में बादरायण आचार्य को प्रमाण है। अर्थात् जैसा ' पर्वतो वह्निमान् '=पर्वत अग्निवाला है, इत्यादि वाक्य इन्द्रियदोषयुक्त पुरुष के (जिस को धुंध आदि कारण से पर्वत में मिथ्या अग्नि का भान है) कहे हुए अर्थ (अग्नि)