मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 501, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवों अध्याय । ३६१ अशासंस्तस्करान्यस्तु बलिं गृह्णाति पार्थिवः । तस्य प्रक्षुभ्यते राष्ट्रं स्वर्गाच्च परिहीयते ॥ २५४ ॥ निर्भयं तु भवेद्यस्य राष्ट्रं बाहुबलाश्रितम् । तस्य तद्वर्धते नित्यं सिच्यमान इव द्रुमः ॥ २५५ ॥ विविधांस्तस्करान् विद्यात्परद्रव्यापहारकान् । प्रकाशांश्चाप्रकाशांश्च चारचक्षुर्महीपतिः ॥ २५६ ॥ प्रकाशवञ्चकास्तेषां नानापण्योपजीविनः । प्रच्छन्नवञ्चकास्त्वेते ये स्तेनाटविकादयः ॥ २५७ ॥ उत्कोचकाश्चौपधिका वञ्चकाः कितवास्तथा । मङ्गलादेशवृत्ताश्च भद्राश्चेक्षणिकैः सह ॥ २५८ ॥ असम्यक्कारिणश्चैव महामात्राश्चिकित्सकाः । शिल्पोपचारयुक्ताश्च निपुणाः पण्ययोषितः ॥२५६॥ अच्छे प्रकार देश वसानेवाला और शास्त्रानुसार किला बनाने वाला राजा नित्य चोरों के नाश का पूरा उपाय करे । प्रजापालक राजा सदाचारियों की रक्षा और दुष्टों को दण्ड करने से स्वर्ग- गामी होता है । जो राजा चोरों को दण्ड न देकर प्रजा से कर लेता है उसकी प्रजा अप्रसन्न रहती है और वह स्वर्ग से पतित होता है । जिस राजा का देश निर्भय होता है वह देश जल से सींचे वृक्ष की भांति नित्य बढ़ता है । चार-दूतरूपी आँखवाला राजा दो प्रकार के परद्रव्य हरनेवाले चोरों को जाने । एक प्रकट, दूसरे अप्रकट । उन में नाना प्रकार के व्यापारवाले प्रत्यक्ष चोर हैं और वन में रहनेवाले छिपे चोर हैं । रिश्वतखोर, भय दिखाकर धन लेनेवाले, ठग, जुआरी, तुमको धन मिलेगा ऐसी मीठी बातों से बहकानेवाले, ऊपर धार्मिक हृदय में पापी, ४६